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बच्चे को बच्चा ही रहने दें, बच्चा जितना मुक्त और हल्का रहेगा, उतना ही खिलेगा

बच्चे को बच्चा ही रहने दें, बच्चा जितना मुक्त और हल्का रहेगा, उतना ही खिलेगा ‘कृतार्थ बेटा, तुम बड़े हो …


बच्चे को बच्चा ही रहने दें, बच्चा जितना मुक्त और हल्का रहेगा, उतना ही खिलेगा

बच्चे को बच्चा ही रहने दें, बच्चा जितना मुक्त और हल्का रहेगा, उतना ही खिलेगा

‘कृतार्थ बेटा, तुम बड़े हो न? छोटे भाई को तुम्हारा खिलौना चाहिए तो दे दो न। बेटा तुम बड़े हो, तुम्हें समझना चाहिए।’ ज्यादातर घरों में दो बच्चे होते हैं तो वहां यही समस्या होती ही है। एक पर प्यार का दरिया बहता है तो दूसरे को समझदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। एक की तमाम बातों का बखान होता है तो दूसरे की छोटी-छोटी बातें माता-पिता को खराब लगती हैं। जबकि सभी माता-पिता यही दलील देते हैं कि उनके लिए दोनों संतानें एक जैसी हैं। इनमें कोई भेदभाव नहीं है। पर सही पूछो तो लगभग हर घर में एक अधिक अच्छा लगता बच्चा और एक मात्र समझदार बनने के लिए पैदा हुआ हो इस तरह का बच्चा होता है। यहां समस्या यह होती है कि यह भेदभाव बचपन में मात्र छोटे बच्चों को खुश करने कर लिए शुरू होता है और यह बचपन में खत्म हो जाने के बजाय बच्चे बड़े हो जाते हैं, उनकी शादियां भी हो जाती हैं, तब भी चलता रहता है। बच्चों की शादी के बाद यह भेदभाव उनकी पत्नियों के साथ भी चलता रहता है। यहां बच्चों में मात्र बेटों कि ही बात नहीं हो रही है, बेटा और बेटी दो हों तो भी यह भेदभाव मां-बाप से जाने-अनजाने में होता है।

 बराबरी भी अच्छी नहीं

बच्चे को बच्चा ही रहने दें, बच्चा जितना मुक्त और हल्का रहेगा, उतना ही खिलेगा

यहां मात्र अपनी संतानों के साथ भेदभाव की बात तक ही सीमित नहीं है, तमाम पेरेंट्स बराबरी के बोझ तले भी अपने बच्चों के बचपन को रूंधने का काम जाने-अनजाने में कर डालते हैं। यहां जाने-अनजाने शब्द पर इसलिए जोर दिया जा रहा है, क्योंकि मां-बाप इस बात को समझ नहीं पाते और जब यह बात उनकी समझ में आती है, तब वे अफेंसिव फील करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि मां-बाप के लिए तो सभी बच्चे एक जैसे ही होते हैं, वे भेदभाव थोड़े ही कर सकते हैं। पर सच्चाई यह है कि यह भेदभाव उनके व्यवहार में आ जाती है। खैर, हम बराबरी की बात कर रहे थे। अपना बच्चा पढ़ने में कमजोर हो या किसी काम में कमजोर हो तो अक्सर हमने पेरेंट्स को यह कहते सुना है कि सामने वाले घर में तुम्हारा मित्र कितना होशियार है, वह कितनी अच्छी तरह पढ़ता है और एक तुम हो? यह बराबरी भले बच्चे को अच्छा बनाने के आशय से की जा रही होती है, पर बच्चे के लिए यह अत्यंत दुखद बात है। हमें यह समझना चाहिए कि बराबरी समझदार व्यक्ति को भी अच्छी नहीं लगती तो छोटे बच्चों को कैसे अच्छी लगेगी। बराबरी का सीधा असर बच्चे के मानसपट पर ऐसा पड़ता है कि उसे लगता है कि मां-बाप उसे प्यार नहीं करते। यहां एक-दो बार की बराबरी की बात नहीं हो रही है, यह बराबरी की बात हमेशा होती रही तो बच्चा यह सोचने लगता है कि आप कभी मार्क करें कि आप अपने बच्चे के सामने किसी दूसरे बच्चे की खूब तारीफ करें तो उसके चेहरे के हावभाव कैसे होते हैं।

 बुरा असर

अगर बारबार बच्चों का पक्षपात किया जाए या बारबार किसी दूसरे बच्चे से बराबरी की जाए तो आगे चल कर इन बातों का बच्चे पर बुरा असर पड़ता है। बराबरी और पक्षपात बच्चों को अंदर से तोड़ देती है, दुखी करती है या फिर निष्ठुर बना देती है। शुरुआत में वह इन बातों से दुखी होता है। फिर वह यह सोचने लगता है कि ठीक है, मेरा जो मन होगा, मैं वही करूंगा। मम्मी-पापा पर तो इसका कोई असर होगा नहीं। वे तो छोटे भाई या बहन को ही सच्चा और अच्छा मानते हैं। तमाम बच्चे यह भी सोचने लगते हैं कि उनके माता-पिता के मन में उनके लिए प्यार ही नहीं है। इसीलिए वे ऐसा कर रहे हैं। इसलिए समय के साथ वे बगावती बन सकते हैं। बाल मानसपट पर पक्षपात या बराबरी का बुरा असर इस हद तक कतई न होने दें। यह बच्चों को तकलीफ के अलावा और कुछ नहीं देगा।

बच्चों को असफलता भी पचाना सिखाएं

अनुपम खेर ने अपने एक इंटरव्यू में अपना और अपने पिता का बहुत बढ़िया उदाहरण दिया था। उन्होंने कहा था कि मेरे पिता बहुत स्ट्रिक्ट थे। उनके द्वारा दी गई पाकेट मनी खर्च हो जाए तो फिर उनसे मांगने में डर लगता था। इसके बजाय एक दिन वह बिना कारण अचानक उन्हें शापिंग कराने ले गए। उन्हें बाहर खिलाया, तमाम चीजें खरीद कर दीं, फिल्म दिखाई और पूरे दिन घुमाया। इतना सब करने के घर आ कर उन्होंने पापा से पूछा कि आज अचानक आप मुझे घुमाने और खरीदारी कराने क्यों ले गए थे? तब उनके पापा ने कहा कि बेटा आज मैं तुम्हारा रिजल्ट लेने गया था, जिसमें तुम फेल हो। पूरी दुनिया लोगों की सफलता का उत्सव मनाती है, पर मैं ने आज तुम्हारी असफलता का उत्सव मनाया है, तुम्हें मात्र यह सिखाने के लिए कि असफलता भी जीवन का एक हिस्सा है। असफलता आने वाली सफलता का पाया है। इस समय मिली असफलता जीवन का अंत नहीं है। बहुत सारी बातें हैं। आप अपने बच्चे को हमेशा सफल होने के लिए प्रेशराइज करते रहेंगे, उसकी बराबरी दूसरे बच्चों से करते रहेंगे तो उसके अंदर असफलता का भय बैठ जाएगा। कभी यह भय उसे गलत कदम उठाने के लिए मजबूर कर सकता है। इसलिए बच्चे को सफलता के लिए प्रेशराइज न करें। उसे असफलता को पचाना और सफल होना सिखाएं। याद रखें कोई भी व्यक्ति जीवन में ठोकर खाए बगैर आगे नहीं बढ़ सकता। जीवन में अलग-अलग पड़ाव पर परीक्षा तो उसे देनी ही होगी। अंत में मात्र इतना ही कि आप अपने बच्चे के मन में यह बात बिलकुल न आने दें कि मेरे मम्मी-पापा मुझसे अधिक मेरे भाई-बहन को पसंद करते हैं या प्यार करते हैं। उसके मन में यह बात भी न आने दें कि मैं चाहे जो भी करूं, मेरे मम्मी-पापा पर कोई फेर नहीं पड़ने वाला। उसके मन में यह भी न आने दें कि मैं असफल हो गया तो अपने मम्मी-पापा को कैसे मुंह दिखाऊंगा? बच्चे को इस उम्र में मां-बाप के प्यार की जरूरत होती है, पक्षपात, किसी से बराबरी या प्रेशर की नहीं।

सिखाने के अन्य बहुत तरीके हैं

बच्चे को बच्चा ही रहने दें, बच्चा जितना मुक्त और हल्का रहेगा, उतना ही खिलेगा

आप सचमुच अपने बच्चे को आगे बढ़ना सिखाना चाहते हैं तो उसे दूसरे अनेक तरीके से सिखाएं। हां, कभी किसी दूसरे का उदाहरण दे दें, यह अलग बात है। पर महिलाओं की आदत होती है कि अपने बच्चों के सामने दूसरे की अच्छाई का बखान कर के सिखाने का प्रयास करती हैं। बच्चे को किसी दूसरे का उदाहरण देने के बजाय वह कैसे अपना काम अच्छी तरह करे, यह समझाएं। बड़े बच्चों पर भी यह लागू होता है। बड़ी संतानों को भी किसी दूसरे के गुण गा कर टांट मार कर समझाने के बजाय माता-पिता अपनी संतान से क्या अपेक्षा रखते हैं, यह समझाएं। हो सके तो यह समझाएं कि बच्चे अपना काम कैसे अच्छा कर सकते हैं, कैसे आगे बढ़ सकते हैं।

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स्नेहा सिंह

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