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बचपन| kavita-Bachpan

kanchan chauhan, poem

बचपन| kavita-Bachpan

बचपन हंसता खिलखिलाता बचपन,कितना मन को भाता है। पीछे मुड़कर देखूं और सोचूं, बचपन पंख लगा उड़ जाता है। बड़ी …


बचपन

हंसता खिलखिलाता बचपन,कितना मन को भाता है।
पीछे मुड़कर देखूं और सोचूं, बचपन पंख लगा उड़ जाता है।

बड़ी रीझ थी बड़े होने की, कितने सपने पाले थे।
बड़े हो कर हम ये करेंगे,वो बनेंगे, कितने पंख लगा डाले थे।

बिना पंख के उड़ना तो बस बचपन में ही सम्भव था।
बड़े हुए तब जाकर हम, असल जीवन से दो-चार हुए,

अपना सोचें तो अपने रूठें,अपनों का सोचें तो सपने टूटें,
ऐसा होता है बड़े होना , कभी ऐसा तो नहीं सोचा था।

भूल गए अपनी मनमर्जी,भूलें बिसरे सब राग हुए।
ना अपनी मर्ज़ी से जाना, मनमानी अब ना कर पाना,
अपनी बात भी ना रख पाना,बेबस अपने हालात हुए।

कहने को सब कुछ अपना है,पर अपना अब कुछ भी नहीं।
जो मेरा है वो सब का है, जो सबका है वो मेरा नहीं।
ख्वाबों की दुनिया से निकल कर, सच से जब दो-चार हुए,

जाना और फिर हमने माना ,बचपन होता है बड़ा सुहाना ,
हम फिर से जीना चाहें वहीं दिन, मन फिर से बच्चा बनना चाहें।

हंसता खिलखिलाता बचपन, अब कितना मन को भाए।
पंख लगा उड़ गया जो बचपन,अब भी यादों में जिंदा हैं

सौ बातों की एक बात है,अब वो दिन ना वापस आने हैं।
जीना है अब तो इसी पल को,हर पल जी भर कर जी लो।

जीवन का हर लम्हा अनमोल है, लौट कर ना फिर आएगा।
बीती बातों को याद करने में,ये लम्हा भी चला जाएगा।

जीना है अब हर पल को,हर लम्हा जी भर कर जी लो।
यही है जीवन की सुंदरता है, हर पल को जी भर जी लो।

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कंचन चौहान,बीकानेर

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