Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Bhawna_thaker, story

प्रीत न करियो कोई

 “प्रीत न करियो कोई”                               एक …


 “प्रीत न करियो कोई”

                             भावना ठाकर 'भावु' बेंगलोर
एक प्रेम कहानी का मुख्य किरदार थी वो “नाम सिया” चिड़ीया सी चहचहाती गुड़िया की आवाज़ रुक गई, थम गई, कोई नहीं जानता कहाँ खो गई। गाँव के ज़मीनदार की रुपवती बेटी थी सिया। अठारहवां साल बैठा ही था की मुखिया के ही खेत में काम करने वाले मोहन के बीस साल के बेटे अर्जुन को दिल दे बैठी। जिस घर में बेटी को ऊँची आवाज़ में बात करना भी गुनाह समझा जाता हो वहाँ प्यार, इश्क, मोहब्बत वो भी बेटी करें? वो भी अपने ही खेत में मजदूरी करने वाले से। मुखिया को जीवन में दो ही चीज़ प्यारी थी बेटी सिया और अपनी इज्ज़त। पर बिटिया नादान थी, प्यार कहाँ जात-पात, ऊँच-नीच देखता है। एक उम्र होती है जिसमें बस हो जाता है। जवानी दीवानी होती है साहब। दुन्यवी रवायतों से अन्जान अपनी चाहत को परवाज़ देते दो दिल एक दूसरे के संग प्रीत के धागे से ऐसे बंध कर चाहत को परवान चढ़ा रहे थे कि दोनों के लिए बीच खड़ी असमानता की गहरी खाई दोनों के लिए बेमानी हो गई। मोहब्बत दिन दुगनी, रात चोगुनी बढ़ रही थी। एक साल तक खेतों में छुप छुपकर मिलने का सिलसिला चलता रहा। बारिश के बाद गेहूँ की फ़सलें दुई माले सी ऊँची लहलहा रही थी, आज शाम ढ़लते ही पूरे खेत का मुआयना करने मुखिया खुद निकला था। एक चास के पीछे हल्की सी गतिविधि को अनुभवी कानों ने सुन लिया कदम थम गए और अपनी ही तनया की हरि चुनर की हल्की दिख रही कोर को बाप की आँखों ने पहचान लिया। इज्ज़त और अहं के आगे पिता का प्यार हार गया। दूर हँसिए से घास काट रहे कलवा की ओर देखकर एक इशारा हुआ। नहर में रक्त रंजीत पानी हिलौरे ले रहा था।

मुखिया को पूछने की किसी में हिम्मत नहीं कि बिटिया क्यूँ दिख नहीं रही। अर्जुन के पिता मुखिया का नौकर मोहन सबको कहता है अर्जुन शहर चला गया।

पर लोग कहते है रात को खेत के उस तरफ़ से गुज़रो तो सुबकती हुई दो आवाज़ें सुनाई देती है एक लड़के की, एक लड़की की, जो कहती रहती है प्रीत न करियो कोई। पूरा गाँव मौन है उन दो किरदार की तरह पर सबके दिल से वही आवाज़ आती है, इस गाँव में प्रीत न करियो कोई।

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर


Related Posts

बजट में खेलिए ज़िंदगी की रेस आसान लगेगी

October 17, 2022

“बजट में खेलिए ज़िंदगी की रेस आसान लगेगी” परिवार चलाना कोई बच्चों का खेल नहीं, लोहे के चने चबाने जितना

पुरानी चीज़ों का सुइस्तेमाल करें

October 17, 2022

 “पुरानी चीज़ों का सुइस्तेमाल करें” दिवाली नज़दीक आ रही है, तो ज़ाहिर सी बात है सबके घर के कोने-कोने की

क्यूँ न बच्चों को संस्कृति से परिचय करवाया जाए

October 17, 2022

“क्यूँ न बच्चों को संस्कृति से परिचय करवाया जाए” आजकल की पीढ़ी भौतिकवाद और आधुनिकता को अपनाते हुए अपने मूलत:

खुद को अपडेट करते हुए आगे बढ़ो

October 17, 2022

 “खुद को अपडेट करते हुए आगे बढ़ो” उपर वाले ने हर इंसान को एक सा बनाया होता है। जब हम

अपनी स्त्री की ‘ना’ को समझने की समझ कितने मर्दों में होती है?

October 11, 2022

 अपनी स्त्री की ‘ना’ को समझने की समझ कितने मर्दों में होती है? क्यूँ दब जाती है नारी की ‘ना’

क्यूँ हमारा देश सफ़ाई के मामले में विदेशों के मुकाबले पीछे है

October 3, 2022

 “क्यूँ हमारा देश सफ़ाई के मामले में विदेशों के मुकाबले पीछे है” सफ़ाई के मामले में हमारा देश विदेश की

PreviousNext

Leave a Comment