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प्रणय की धारा- डॉ हरे कृष्ण मिश्र

प्रणय की धारा मन का स्रोत बहुत है गहरा ,मन से निकली प्रणयकी धारा ,मन और धन का खेल निराला, …


प्रणय की धारा

प्रणय की धारा- डॉ हरे कृष्ण मिश्र
मन का स्रोत बहुत है गहरा ,
मन से निकली प्रणयकी धारा ,
मन और धन का खेल निराला,
उसको समझ नहीं हम पाए ,
विवेक बंधन का ज्ञान नहीं है ,
तोड़ दिया करते हम बंधन ,
गीता का दर्शन बांध रहा मन,
अंतर स्थल को छू छूकर,।।

विवेक हमारा टिक नहीं पाता ,
आकांक्षाओं की लहरों में,
लहरें उठती और गिरती हैं ,
मेरे मन के अंतर्मन में।

मेरा मन कितना है चंचल,
सोच नहीं पाता हूं मैं,
एकाग्रता की कमजोरी है,
मन से हार गया हूं मैं।

चंचल मन को बांधूं कैसे,
योग हमारा टिक नहीं पाता,
गीता योग शास्त्र है अपना,
चल बांधू इसके दर्शन से ।।

कठिन तपस्या मन को साधना,
और चंचल कोई नहीं है इतना,
बांध सको तो स्वयं को बांधों ,
मन बंधन करता स्वीकार नहीं ।

तेरे ही प्रभाव में, अभाव में रहा नहीं,
प्यार का प्रभाव था प्यार बांटता चला,
दूर तुमसे नहीं तुम तो मेरे साथ हो,
बंधा हुआ मन मेरा बंधन भी अटूट है।

तुम से अलग खलती रही, आधी अधूरी जिंदगी,
बिन तुम्हारे रह न पायी मिट चली है जिंदगी ,
अवशान के क्षण दे गयी है दर्द कितनी जिंदगी ,
याद मिट पाती नहीं है न गुजर पायेगी जिंदगी , ।।

है समर्पित याद में कुछ बंद मेरे छंद के,
रह गए अधूरे गीत मेरे दर्द में प्यार के ,
शब्द अधर में गौन होकर मौन करके,
ले चली किस ओर विवश मेरी जिंदगी ।।

बिन तुम्हारे गीत मेरे सब अधूरे रह गए ,
संभावना से दूर इनकार करती जिंदगी,
है कहां अवशेष जीवन ज्ञात भी है नहीं,
दूर तुमसे चल सकूं स्वीकार भी है नहीं ।।

मैं किनारे पर खड़ा तू रही जलधार में,
दूरियां बढ़ती गई क्या करूं इस पार में,
साथ हम इस पार थे आगे नहीं है ज्ञात,
इक विडंबना बन गई आज मेरी जिंदगी ।।

साथ तुम्हारे बहुत दूर तक मैंने जीवन जिया है,
नियति की भी कैसी मर्जी तुमसे दूर अकेले हैं ,
दूर किनारा धुंधला धुंधला नहीं दिखाई देता है,
ज्ञात नहीं गंतव्य तुम्हारा इसकी पीड़ा मुझको है।।

कोई तो सहयोगी होता हम भी चलते धीरे-धीरे,
तुम्हारा भी अनुमोदन मिलता मेरे छोटे जीवन में,
शाम सवेरे नित्य हमारे दिनचर्या में तुम रहती हो,
दे दो अपना स्वर गीतों को छंद हमारे बने अधूरे ।।

सतीत्व के अभाव में अस्तित्व मेरा गौण है,
जिंदगी के द्वार पर एक करुण पुकार है ,
बना था तारतम्य अपना गृहस्थी अच्छी थी,
सुनाऊं क्या तुम्हें अपना अकेला ही बैठा हूं।।

बीतेगी अंधेरी रात इतना विश्वास ही मेरा ,
शेष बचा घनी भूत जीवन कामना से पूर्ण,
कश्ती हमारी डूब गई मझधार में दूर तुमसे,
साहिल की आशा टूट गई बीच मझधार में ।।

दुनिया हमारी मुट्ठी में आज है कल भी रहेगी,
संकल्प अपना है हमारा साथ दुनिया भी चलेगी,
हैं सजग हम विश्व प्रहरी सब हमारा ही है अपना,
चिंतन हमारा भी गहन है विश्व से हम जुड़ गए हैं ।।

खेद है अपने पराए न जाने क्यों बन गए हैं ,
सोचता उनसे भी पूंछूं क्या खता मेरी बनी है,
है बचा मतभेद कैसा आ बिचारें मिलकर,
हम तुम्हारे साथ हैं आ चलो इक राह पर ।।

मौलिक रचना
डॉ हरे कृष्ण मिश्र
बोकारो स्टील सिटी
झारखंड। दि,। १९.१२.२१


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