Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Dr-indu-kumari, poem

पृथ्वी दिवस

 पृथ्वी दिवस डॉ. इन्दु कुमारी  वसुंधरा को आइए  पेड़ों से सजाइए  वन बागों से इस धरा पर  जीवन की फसलें …


 पृथ्वी दिवस

डॉ. इन्दु कुमारी
डॉ. इन्दु कुमारी

 वसुंधरा को आइए 

पेड़ों से सजाइए 

वन बागों से इस धरा पर 

जीवन की फसलें उगाइए

स्वच्छ जीवन और संस्कार 

 स्वस्थ जीवन अच्छा व्यवहार

 हम मानव गर सुधर जाएं 

पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आए 

ना मारा मारी होगी 

ना ही कोई बीमारी होगी 

हम अपने घर सजाते हैं 

उसी तरह धरा को सजाइए 

यह धरती पावन है 

बड़ी ही मनभावन है 

यह धरा है उर्वरा

 सोने उगलती वसुंधरा

 यह शान है अभिमान है

 इस पर ही बसते हमारा प्राण है 

इस मिट्टी के खातिर 

देते सदा बलिदान है 

इस मिट्टी पर जान लुटाना है 

इस पर ज्यादती ना ढाना है 

यही है जीवन का आधार 

इसे सजाए बारंबार 

टिकी है इन पर ही संसार 

इसे न बनाए हम व्यापार  

हरियाली जब धरा पर छाएगी 

तभी जीवन बच पाएगी

 होगी सदा जीवो का कल्याण

 मान मान ओ मानुष मान।

तुम्हारा है कर्तव्य महान 

इस पर अमल करो नादान

बन जाओगे फिर भगवान

बदले में मिलेगा जीवनदान

होगा सबका कल्याण

 मेरा भारत है महान।    

     डॉ. इन्दु कुमारी 

मधेपुरा बिहार


Related Posts

स्वयं प्रेम कविता -डॉ. माध्वी बोरसे!

December 3, 2021

स्वयं प्रेम! स्वयं प्रेम की परिभाषा,बस खुद से करें हम आशा,स्वयं का रखें पूरा ख्याल,खुद से पूछे खुद का हाल!

हार कविता -डॉ. माध्वी बोरसे!

December 3, 2021

हार! बेहतर होने का अनुभव देती हैं,यह तो सीरीफ एक परिस्थिति है,सफलता का सबसे बड़ा रास्ता होती है,कुछ देर की

21 वीं सदी की नारी-डॉ. माध्वी बोरसे!

December 3, 2021

21 वीं सदी की नारी! उठाओ कलम, पुस्तक व लैपटॉपकरो परीक्षा की तैयारी,कुछ तुम उठाओ,कुछ परिवार में बाटोअपने घर की

सोच में लाए थोड़ा परिवर्तन -डॉ. माध्वी बोरसे!

December 3, 2021

सोच में लाए थोड़ा परिवर्तन ! कोई कोई तहजीब, सलीका, अदब नहीं खोता,सर झुकाता हुआ हर शख्स बेचारा नहीं होता!

मिट्टी का कर्ज- डॉ.इन्दु कुमारी

December 3, 2021

 मिट्टी का कर्ज खूबसूरत है नजारालग रहा है प्यारा इस मिट्टी का कर्ज हैचुकाना हमारा फर्ज  है प्यारे गगन हमें

साहिल- डॉ.इन्दु कुमारी

December 3, 2021

 साहिल ओ मेरे मन के मीत दिल लिया क्यों जीत निश्छल है मेरी प्रीत रेजीवन की है ये रीत सदा

Leave a Comment