Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Jitendra_Kabir, poem

पाखंड लगता है- जितेन्द्र ‘ कबीर ‘

पाखंड लगता है एक विजेता!अपने सारे संसाधनझोंक देता हैयुद्ध के मैदान मेंजीत के लिए,विजय उसका चरित्र हैलेकिनजब वो लगाता है …


पाखंड लगता है

पाखंड लगता है- जितेन्द्र ' कबीर '

एक विजेता!
अपने सारे संसाधन
झोंक देता है
युद्ध के मैदान में
जीत के लिए,
विजय उसका चरित्र है
लेकिन
जब वो लगाता है मुखौटा
संत का
तो पाखंड लगता है।
एक रणनीतिकार!
साम दाम दण्ड भेद सारे तरीके
अपनाता है
शत्रु को अलग-थलग कर
हराने के लिए,
कुटिलता उसका चरित्र है
लेकिन
जब वो लगाता है मुखौटा
भोलेपन का
तो पाखंड लगता है।
एक अतिवादी!
अपने मत के विरोध की
हर संभावना का
छल-बल से करता है
प्रतिकार,
द्वेष उसका चरित्र है
लेकिन
जब वो लगाता है मुखौटा
समभाव का
तो पाखंड लगता है।
एक अवसरवादी!
अपने मंतव्य की राह में
आने वाले
हर एक कांटे को
उखाड़ फेंकता है निर्ममता से,
क्रूरता उसका चरित्र है
लेकिन
जब वो लगाता है मुखौटा
दयालुता का
तो पाखंड लगता है।
एक सुविधा प्रेमी!
राज्य के खर्चे पर
जुटाता है अपने लिए
तमाम सुविधाएं,
विलासिता उसका चरित्र है
लेकिन
जब वो लगाता है मुखौटा
जनसेवा का
तो पाखंड लगता है।
एक प्रसिद्धि पिपासु!
अपने छोटे से छोटे काम को
प्रचारित करता है
दुनिया के महानतम कामों में,
आत्मश्लाघा उसका चरित्र है
लेकिन
जब वो लगाता है मुखौटा
दीन-हीन का
तो पाखंड लगता है।

जितेन्द्र ‘ कबीर ‘
यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।
जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश 176314
संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

बंद कमरों की घुटन-सुधीर श्रीवास्तव

May 9, 2022

 बंद कमरों की घुटन आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने खुद ही खुद को कैद कर लिया है कंक्रीट के

कविता डिजिटल भारत मेक इन इंडिया

May 9, 2022

कविता डिजिटल भारत मेक इन इंडिया रचनात्मक नवाचार से जुड़ा विज्ञान आम आदमी के लिए जीवन में सहजता लाता है

शोहरतों का परचम- सुधीर श्रीवास्तव

May 9, 2022

 शोहरतों का परचम शोहरतों के परचम  लहराने का गर इरादा है तो कुछ ऐसा कीजिए जो अलग हो औरों से

ज़िंदगी- सुधीर श्रीवास्तव

May 9, 2022

 ज़िंदगी वाह री जिंदगी तू भी कितनी अजीब जाने क्या क्या गुल खिलाती है कभी हंसाती, कभी रुलाती है और

कविता – ख्वाब – सिद्धार्थ गोरखपुरी

May 9, 2022

 कविता – ख्वाब  ये ख्वाब न होते तो क्या होता? झोपड़ी में रहने वाले लोग जब थोड़े व्यथित हो जाते

जलियांवाला बाग-

May 9, 2022

 जलियांवाला बाग बैशाखी का पावन दिन तारीख तेरह अप्रैल उन्नीस सौ उन्नीस एक सभा हो रही थी रौलेट एक्ट का

PreviousNext

Leave a Comment