Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Jayshree_birmi, poem

पड़ाव

पड़ाव ढल रही थी सांझ सी उम्र की लाली भीगहरी होती जा रही थी समझदारी की लकीरेंबालों में भी शुरू …


पड़ाव

जयश्री बिरमी अहमदाबाद

ढल रही थी सांझ सी उम्र की लाली भी
गहरी होती जा रही थी समझदारी की लकीरें
बालों में भी शुरू हो चुकी थी बिखरनी चांदी
चाल जो थी नटखट झरने सी वह नदी सी गंभीर बहने लगी थी
संभल नहीं पा रही थी जिम्मेवारी की जोलियां
उठा के अपने ही बदन को चलना होता जा रहा था दुश्वार
लग रहे थे भारी वहीं गहने जिसका शौक था कभी भारी
जुकती जा रही थी कमर और पैर थक कर रह गए थे
लेकिन गौरवान्वित गर्दन थोड़ी और ऊंची हो रही थी
जो कहती थी आत्मगौरव की गाथा
जो लिखी थी इन सत्तर सालों में
चल रही थी संग संग वही बरसों से
जो संग
आज भी वही तो दिलाती हैं उमंग
छोड़ जीवन पथ में आई रातों की कालिमा को कोसों दूर
लो चली जा रही हूं जीवन पथ पर मगरुर

जयश्री बिरमी
अहमदाबाद


Related Posts

व्यंग काव्य

October 10, 2022

व्यंग काव्य सजाया बहुत मुझे रणबीरंगे वस्त्रों सेभरा हैं मुझे कईं घातक पटाखों सेइकठ्ठा हुआ हैं शहर सारा मुझे जलानेऊंचा

और कितने रावण होंगे?

October 10, 2022

और कितने रावण होंगे? आज मैं बाहर जा रही थी तो प्रहलदनगर से थोड़ा आगे जा कर बहुत से लोग

कुछ ऐसे अफ़सर होते हैं

October 9, 2022

व्यंग्य-कविता कुछ ऐसे अफ़सर होते हैं कुछ ऐसे अफ़सर होते हैं जो ज्ञान के खोते होते हैं ऑफिस में सोते

स्वच्छ सर्वेक्षण पुरस्कार 2022 प्रदान किए गए

October 5, 2022

कविता स्वच्छ सर्वेक्षण पुरस्कार 2022 प्रदान किए गए हर वर्ष की तरह इस वर्ष एक अक्टूबर 2022को स्वच्छता सर्वेक्षण पुरस्कारों

कविता–उपभोक्ताओं को ख़ुशी समृद्धि में भिगोना है

October 3, 2022

कविता–उपभोक्ताओं को ख़ुशी समृद्धि में भिगोना है बिज़ली पेट्रोल डीजल कीमतों को एक राष्ट्र एक मूल्य दायरे में लाना है

गुंजा के दाने

October 1, 2022

गुंजा के दाने रमणीय , मनमोहक , चमकदारगुंजा के दाने मन को हर जाते हैसुर्ख चटकीले लाल रंग लिये येकाले

PreviousNext

Leave a Comment