Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Jayshree_birmi, poem

पड़ाव

पड़ाव ढल रही थी सांझ सी उम्र की लाली भीगहरी होती जा रही थी समझदारी की लकीरेंबालों में भी शुरू …


पड़ाव

जयश्री बिरमी अहमदाबाद

ढल रही थी सांझ सी उम्र की लाली भी
गहरी होती जा रही थी समझदारी की लकीरें
बालों में भी शुरू हो चुकी थी बिखरनी चांदी
चाल जो थी नटखट झरने सी वह नदी सी गंभीर बहने लगी थी
संभल नहीं पा रही थी जिम्मेवारी की जोलियां
उठा के अपने ही बदन को चलना होता जा रहा था दुश्वार
लग रहे थे भारी वहीं गहने जिसका शौक था कभी भारी
जुकती जा रही थी कमर और पैर थक कर रह गए थे
लेकिन गौरवान्वित गर्दन थोड़ी और ऊंची हो रही थी
जो कहती थी आत्मगौरव की गाथा
जो लिखी थी इन सत्तर सालों में
चल रही थी संग संग वही बरसों से
जो संग
आज भी वही तो दिलाती हैं उमंग
छोड़ जीवन पथ में आई रातों की कालिमा को कोसों दूर
लो चली जा रही हूं जीवन पथ पर मगरुर

जयश्री बिरमी
अहमदाबाद


Related Posts

मेरे लेखन का ध्येय- जितेन्द्र ‘कबीर

February 14, 2022

मेरे लेखन का ध्येय मुझे पता है कि आजकल मेरा लेखनसरकार में शामिल दलों औरउनके समर्थकों को नहीं भाता हैक्योंकि

जनता का जूता जनता का ही सिर-जितेन्द्र ‘कबीर’

February 14, 2022

जनता का जूता जनता का ही सिर देश में उपलब्ध होने वालीहर एक वस्तु एवं सेवा परमनचाहा कर लगाकर लोगों

इंसान और शैतान- जितेन्द्र ‘कबीर’

February 14, 2022

इंसान और शैतान शरीर एक सा ही है,सत्य, स्नेह, शांति और भाईचारे मेंविश्वास रखने वाला‘इंसान’ हो जाता हैऔरझूठ, घृणा, कलह

कितना मुश्किल है गांधी बनना- जितेन्द्र ‘कबीर

February 14, 2022

कितना मुश्किल है गांधी बनना कितना आसान है!किसी से नाराज होने परउसके अहित की कामना करना,किसी से अपना मत भिन्न

दोमुंहे सांप- जितेन्द्र ‘कबीर’

February 14, 2022

दोमुंहे सांप वो लोगजो जहर उगलते हैंसार्वजनिक मंचों पर हर समयदूसरों के लिए,होते होंगे क्या इतने ही जहरीलेअपनी निजी जिंदगी

गणतंत्र मनाओ – गणतंत्र बचाओ-जितेन्द्र ‘कबीर’

February 14, 2022

गणतंत्र मनाओ – गणतंत्र बचाओ गौरवशाली दिन है यहबड़ी धूमधाम से इसे मनाओ,मायने इसके सही समझकरखत्म होने से इसे बचाओ।लूटतंत्र

Leave a Comment