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Jayshree_birmi, poem

धूप छांव

धूप छांव जिंदगी के रूप कई कहीं मिले धूप छांव आती दुःख की धूप तो सुख की छांव भी अपार …


धूप छांव

धूप छांव
जिंदगी के रूप कई कहीं मिले धूप छांव

आती दुःख की धूप तो सुख की छांव भी अपार

आनी जानी हैं ये माया तुम हो या हो हम
कभी कभी हंसी के फुहारे कभी बहे गुम के आंसू
सुख में जो न बहके दुःख में टूटे न कोई
तो जीवन बने सफल टूट न जाएं कोई
सुख सुविधा चाहे सब मिले जो नसीब में होई
सदा सुख तो होवे नहीं दुःख भी न हरदम होई
रब जी भी हैं दयावान किंतु कर्म फल ये होई

जयश्री बिरमी
अहमदाबाद
(स्वरचित)


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