Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Bhawna_thaker, lekh

दोगलेपन का शिकार समाज

 “दोगलेपन का शिकार समाज” ताज्जुब की बात है 21वीं सदी का पढ़ा लिखा, अंग्रेजी झाड़ने वाला, आधुनिक समाज एक औरत …


 “दोगलेपन का शिकार समाज”

दोगलेपन का शिकार समाज

ताज्जुब की बात है 21वीं सदी का पढ़ा लिखा, अंग्रेजी झाड़ने वाला, आधुनिक समाज एक औरत की खुशी बर्दाश्त नहीं कर सकता। क्या विधवा हो जाने के बाद, या डिवोर्स हो जाने के बाद स्त्री को खुश रहने का कोई हक नहीं, अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का अधिकार नहीं? समाज की घिनौनी और दकियानुसी मानसिकता के अनुसार ही जीना होगा। कितना दोगला है ये समाज एक तरफ़ स्त्री सशक्तिकरण के राग आलाप रहा है और एक तरफ़ अगर कोई स्त्री चुटकी भर खुश रहकर गम को भुलाने की कोशिश करते जी रही है तो उसे ढ़ेरों बातें सुनाकर व्यंग्य बाण छोड़ने से नहीं चुकता।  

कल इंस्टाग्राम पर नीतू सिंह (नीतू ऋषि कपूर) की एक पोस्ट पर लोगों की टिप्पणियां ताज्जुब कर गई। लोग न जानें क्या-क्या सुना रहे थे नीतू सिंह को। पिछले साल ऋषि कपूर दुनिया को अलविदा कह गए, नीतू कपूर दुनिया में अकेली रह गई। अब आहिस्ता-आहिस्ता दु:ख को भूलने की कोशिश में खुद को व्यस्त रखते काम करने लगी है, टीवी पर एक शो की जज के तौर पर, तो ज़ाहिर सी बात है सफ़ेद साड़ी पहनकर तो नहीं बैठेगी थोड़ा सा सज-धज लिया, हंस बोल लिया या दर्शकों की फ़रमाइश पर डांस के दो स्टेप्स क्या कर लिए तो मानों कोई बहुत बड़ा गुनाह कर लिया हो ऐसे लोग ट्रोल कर थे। कुछ तो शर्म लिहाज़ करो, ऋषि कपूर को गुज़रे एक साल ही हुआ है इनको तो कोई दु:ख ही नहीं है कैसे ऐसे कपड़े पहन सकती है कैसे नाच सकती है वगैरह।

पति के गुज़र जाने के बाद औरत चार दिवारी में खुद को कैद करके आँसू बहाती रहे तो ही समाज को लगेगा की उनको पति के जानें का दु:ख हुआ है? सफ़ेद कपड़े, नम आँखें और लटका हुआ चेहरा ही गवाह होता है किसीके गम का? कब तक शोक मनाते बैठी रहे। चलो मान लो पूरी तरह से विधवाओं के लिए लादी गई रस्मों और परंपराओं का पालन कर लिया तो क्या जानें वाला वापस आ जाएगा। और समाज को दिखाने लिए जब तक जिए तब तक झूठे आँसू बहाते सबूत देती रहे तो ही समाज मानेगा की हाँ सच में दु:खी है।

ऐसे ही मंदिरा बेदी के पति राज कौशल का भी पिछले साल निधन हो गया। दो बच्चों के साथ अकेली रह गई मंदिरा ने कुछ दिन पहले अपने दोस्त के साथ एंजॉय करते सोशल मीडिया पर एक तस्वीर ड़ाली उस पर भी हमारे so called समाज ने जमकर लताड़ दिया जैसे मंदिरा को खुश रहने का अब कोई हक ही नहीं रहा। एक स्त्री के लिए अपना पति खोना जीवन की अपूर्णीय क्षति होती है, उस दर्द को शब्दों में बयाँ करना मुमकिन नहीं। पर इसका मतलब ये तो नहीं की अपना सबकुछ खो चुकी औरत से आप ज़िंदा रहने की वजह तक छीन लो। अगर कहीं से टुकड़ा भर खुशी पाने की कोशिश करती है तो क्यूँ समाज को अखरता है। 

मलाइका अरोड़ा खान को ही देख लीजिए। पति से तलाक के बाद अर्जुन कपूर के साथ रिश्ता बनाकर खुश रहने की कोशिश की तब उसको भी निम्न स्तरीय शब्दों से ट्रोल करते हल्का दिखाने की कोशिश की जाती है। अरे उनकी अपनी ज़िंदगी है, किसीके भी साथ बिताए रहने दो न खुश। क्या गलत है अगर दो परिपक्व इंसान एक दूसरे के साथ ज़िंदगी जीने का फैसला लेते है दो लोगों की उम्र नहीं सोच मिलनी चाहिए। 

और हद तो तब हुई जब इनकी पोस्ट पर इनको ट्रोल करने वाली ज़्यादातर औरतें थी। जब तक औरत ही औरत की दुश्मन बनी रहेगी हम समाज से क्या उम्मीद कर सकते है। कम से कम महिलाएं तो महिला के पक्ष में रहो।  

ये तो सारी सेलिब्रिटी की बात हुई सोचिए जब लोग इनको भी सरेआम सुनानें से बाज़ नहीं आते तो उन औरतों का क्या होता होगा जो परिवार और समाज की विचारधारा को मानते लादी गई परंपरा का पालन करते जी रही होंगी। उनकी ज़िंदगी तो पति के चले जाने के साथ ही ख़त्म हो जाती होगी।

पर यही सारे नियम, बंदीशें और परंपरा मर्दों पर क्यूँ लागू नहीं होती? पत्नी के गुज़र जाने के बाद या डिवोर्स हो जाने के बाद एक दो महीने में ही दूसरी शादी कर लेते है, मजे से जीते है उनको तो कोई दो शब्द सुनाने नहीं जाते। मर्द क्या समाज का हिस्सा नहीं? मर्द है तो क्या उनको हर बात की, हर चीज़ की छूट मिल जाती है। औरतें क्या इंसान नहीं उनके सीने में दिल नहीं? अरे एक बार खुद खो उन औरतों की जगह रखकर तो देखिए। दु:ख, दर्द, गम, अकेलापन इंसान को भीतर से तोड़ देता है। जीने के लिए अगर कहीं से खुशी पाने की कोशिश करती है तो इतनी जलन क्यूँ, कब प्रक्टिकल बनेगा समाज? कब किसी ओर की ज़िंदगी में दखल देना बंद करेगा। कब विधवा को सम्मान देकर एक खास नज़रिये से देखना बंद करेगा। औरतों के लिए कब एक सकारात्मक सोच का दौर चलेगा? लगता है शायद समाज को मानसिक तौर पर आधुनिक बनने में कुछ सदियाँ ओर लगेगी। 

मत कहो की हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे है, मत समझो खुद को पढ़े लिखे, मत बनो उपर-उपर से आधुनिक अठारहवीं सदी की मानसिकता से घिरा दोगलेपन का शिकार है समाज। जो स्त्रियों को आज भी पैरों की जूती बनाकर रखने में खुद को महान समझता है। महिलाओं के लिए जब पूरे समाज की विचारधारा जड़ से बदल जाएगी तब एक स्वस्थ समाज का निर्माण होगा। तब तक ये समाज अठारहवीं सदी वाला शूद्र गंवार और पशुओं का समाज ही कहलाएगा।  

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर


Related Posts

धनतेरस से भाईदूज तक खुशियों की बारिश हुई/dhanteras se bhaidooj tak khushiyon ki barish

October 25, 2022

धनतेरस से भाईदूज तक खुशियों की बारिश हुई दीपावली पर्व 2022 – खुशियों की गूंज धनतेरस से भाई दूज भाई

भाई -बहन के प्यार, जुड़ाव और एकजुटता का त्योहार भाई दूज

October 25, 2022

भाई -बहन के प्यार, जुड़ाव और एकजुटता का त्योहार भाई दूज हमारे देश में हर महिला भाई दूज को अपने

भारत का दीपोत्सव 2022/15 लाख दीप जलाकर नया विश्व रिकॉर्ड बन गया।

October 24, 2022

 भारत का दीपोत्सव 2022 ,15 लाख दीप जलाकर नया विश्व रिकॉर्ड बन गया। दुनियां भारतीय दीपावली महोत्सव और दीपोत्सव देखकर

भाईदूज का उपहार/Hindi Story -bhaidooj ka uphar

October 23, 2022

Hindi Story -bhaidooj ka uphar. “(भाईदूज का उपहार”) माँ इस बार मैं आपकी नहीं सुनूँगा, दीदी की शादी को तीन

फ़िर नए वेरिएंट की रूप बदलकर तेजी से दस्तक/covid new variant

October 22, 2022

फ़िर नए वेरिएंट की रूप बदलकर तेजी से दस्तक नए वेरिएंट का खतरा बढ़ा – स्वास्थ्य मंत्रालय की हाई प्रोफाइल

मिशन लाइफ (Mission Life)

October 22, 2022

मिशन लाइफ (Mission Life) आओ जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में अपने सामर्थ्य के हिसाब से योगदान दें सुरक्षित पर्यावरण

Leave a Comment