Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

दर्द कहां से पाया हूं ?- डॉ हरे कृष्ण मिश्र

 दर्द कहां से पाया हूं ? तपन जीवन की कहती है ,अपना जो शेष जीवन है ,धरा पर जो सुरक्षित …


 दर्द कहां से पाया हूं ?

Dard kha se paya hu by Dr. H.K Mishra

तपन जीवन की कहती है ,
अपना जो शेष जीवन है ,
धरा पर जो सुरक्षित है,
सब उसी की मर्जी है ।।

चलो एक बार मिलते हैं,
अभी तो दूर मंजिल है।
बता गंतव्य अपना तू ,
अपना प्रयास करता हूं,।।

बचे हैं सांस जो अपने,
उसी पर तो भरोसा है,
जीवन का भरोसा क्या,
रुकेगी कब कहां धड़कन ।।

कहना भी बड़ा मुश्किल,
दर्पण भी तो हंसता है ,
गुजर जाए सही जिंदगी,
अपेक्षा तो हमारी है ।।

गुजरे कुछ हमारे दिन,
आंसू के सहारे ही ,
सिकन बिस्तर बताती हैं ,
यहीं आंसू गिरे तेरे ।।

चलो अपने घर चलें ,
अंतिम शब्द तुम्हारे हैं,
यहीं हंसना यहीं रोना
जिंदगी तो हमारी है ।।

अपने चिंतन से भटक गया,
चिंता में कहा नहीं भटका,
कोई ऐसा पल मिला नहीं,
यादों से दूर गई हो तुम ।।

थका थका जीवन लगता है
दूर गगन तक छांव नहीं है ,
छाया के पीछे दौड़ रहा हूं ,
माया में जीवन घिर आया है।।

ढूंढ रहे हम धरा धाम पर ,
विश्वास हमारा टूट गया है,
दिन-रात भटकता रहता हूं,
अब चैन कहां मिल पाएगा ।।

जीवन के सूनेपन को मैं ,
तेरी यादों से सहलाया हूं ,
सोच नहीं पाया क्या खोकर,
दर्द कहां से पाया हूं ?

मौलिक रचना
                डॉ हरे कृष्ण मिश्र
                बोकारो स्टील सिटी
                  झारखंड ।


Related Posts

Soch kar dekho by Jitendra Kabeer

August 22, 2021

 सोच कर देखो दो महत्वपूर्ण काम राजनीति और अध्यात्म, जो दशा और दिशा तय करते हैं किसी भी राष्ट्र और

Jivan raksha mantra by sudhir Srivastava

August 22, 2021

 जीवन रक्षा मंत्र मानव जीवन में सड़कें  जीवन का अनिवार्य हिस्सा है इसके बिना तो जैसे अधूरा जीवन का किस्सा

Meera diwani kanha ki by Indu kumari

August 22, 2021

 मीरा दीवानी कान्हा की मीरा दीवानी कान्हा की प्रेम से छलकत जाय  जागत रहे दिन -रात फिर भीदरस ना पाय 

Kahin jashn kahin hatasha by Anita Sharma

August 22, 2021

 कहीं जश्न,कहीं हताशा* समय परिवर्तित होता तो है, पर…इतना ? किसी देश में जश्न आजादी, तो कहीं परतंत्रता छाई।  

Kahun kaise by Indu kumari

August 22, 2021

 कहूं  कैसे  मिलूं तो होंठ सट जाते हैं ऐसे रात के अधखिले फूल हो जैसे चाहकर भी वे हिल नहीं

Sirf dikhane ki cheez by Jitendra Kabeer

August 22, 2021

 सिर्फ दिखाने की चीज देखता हूं बहुत बार अपने आस-पास दुनिया भर में अपने भाई चारे और अच्छे रिश्तों का

Leave a Comment