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Dr_Madhvi_Borse, poem

दयावान बने!

दयावान बने! सोए हुए शेर के ऊपर चढ़ा चूहा,शेर उठा और हुआ आग बबूला,गुस्से में कहा, तुम्हें कौन बचाएगा,यह खूंखार …


दयावान बने!

दयावान बने!
सोए हुए शेर के ऊपर चढ़ा चूहा,
शेर उठा और हुआ आग बबूला,
गुस्से में कहा, तुम्हें कौन बचाएगा,
यह खूंखार शेर तुम्हें खा जाएगा!

चूहे ने शेर से की प्रार्थना,
कृपया मुझे मत मारना,
तुम्हारा एहसान में जरूर चुकाऊंगा,
हंसते हुए शेर ने व्यंग्य से कहा,
जाओ मुसीबत में मैं तुम्हें बुलाऊंगा!

कुछ दिन बाद शिकारी आए,
चारों तरफ जाल फैलाए,
शेर को जाल में कैद किया,
शेर ने चिल्लाकर आवाज दिया!

चूहा पहचाना शेर की आवाज,
कुतर के जाल को कर दिया आजाद,
शेर ने कहा चूहे से,
तुम नहीं होते अगर मेरे पास,
मेरे बच पाने की नहीं थी कोई आस!

किसी को उसके आकार से ना परखे,
करुणा भाव स्वयं में अवश्य रखें,
दया अपना इनाम ज़रूर लाती है,
जिंदगी हमें हर मोड़ पर आजमाती है!!

डॉ. माध्वी बोरसे!
( स्वरचित व मौलिक रचना)
राजस्थान (रावतभाटा)


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