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कविता-जो अब भी साथ हैं

परिवार के अन्य सदस्य या तो ‘बड़े आदमी’ बन गए हैं या फिर बन बैठे हैं स्वार्थ के पुजारी। तभी …


परिवार के अन्य सदस्य
या तो
‘बड़े आदमी’ बन गए हैं
या फिर
बन बैठे हैं स्वार्थ के पुजारी।

तभी तो
कोई नहीं ठहरता
उन कमरों के पास
जहाँ
धीरे-धीरे
मौन में बदल रही है
दादा-दादी की पुकार।

न कोई आता है
तन्हाई का साथी बनने
न पूछता है
स्वास्थ्य का हाल
न किसी को याद रहता है
उनके स्वाद की दुनिया।

मैं…
अब और नहीं कह पाऊँगा
उन भावनात्मक स्थितियों के बारे में
मैंने उन्हें जिया है
पर जस का तस
शब्दों में ढाल नहीं सकता।

पर
मैं जो कर सकता हूँ,
वह मैं करता हूँ—
हर दिन
थोड़ी देर सही
पर बैठता हूँ
अपने वृद्ध दादा-दादी के पास।

कभी उनकी हथेली थामकर
कभी बस चुपचाप पास बैठकर
समय को थाम लेता हूँ
उस मोड़ पर
जहाँ दुनिया ने
उन्हें अकेला छोड़ दिया।

-प्रतीक झा ‘ओप्पी’ (उत्तर प्रदेश)
Email Id: Kvpprateekjha@gmail.com


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