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जीवन के हर पड़ाव को अपनाओ और जीभर जियो

जीवन के हर पड़ाव को अपनाओ और जीभर जियो ‘गिलास आधा खाली’ होने की मानसिकता मानवसहज स्वभाव है। किसी को …


जीवन के हर पड़ाव को अपनाओ और जीभर जियो

जीवन के हर पड़ाव को अपनाओ और जीभर जियो

‘गिलास आधा खाली’ होने की मानसिकता मानवसहज स्वभाव है। किसी को कितनी भी सुविधा मिल जाए, फिर भी उसे जीवन में अधूरेपन का अनुभव होता ही रहता है। एक छोटा सा किस्सा यहां लिखने का मन हो रहा है। बात यह है कि दो सहेलियां दस सालों बाद मिलीं। दोनों ने अपने-अपने जीवन की बातें एक-दूसरे से शेयर कीं। दोनों में से एक युवती को एक समय प्यार में धोखा मिला, इसलिए उसने अभी तक विवाह नहीं किया था। अब वह सिर्फ कैरियर पर फोकस करना है, यह सोच कर वह विदेश चली गई थी। जबकि दूसरी युवती ने अपने प्रेमी के साथ विवाह कर लिया था।
दोनों ने अपनी मर्जी से एक-दूसरे के लिए उस समय जो उचित लगा, उस रास्ते को चुन लिया था। पर दस साल बाद काॅफी के टेबल पर मिलने पर दोनों जब एक-दूसरे के जीवन की बातें कर रही थीं तो दोनों को ही काॅफी का गिलास जीवन के अधूरेपन का साक्षी बनता है। शादीशुदा युवती अपनी गैरशादीशुदा सखी की बिंदास लाइफ को देख कर सोचती है कि कैसी मजेदार लाइफ है इसकी लाइफ। कोई जिम्मेदारी नहीं, कोई रोकटोक नहीं, कोई पूछनेवाला नहीं और न ही किसी तरह की किचकिच। इसके तो मजे ही मजे हैं। पैसे कमाओ, जितना मर्जी हो खर्च करो और आनंद से जियो।
जबकि विवाह न करने वाली युवती सोचती है कि इसकी लाइफ कितनी अच्छी है। इतना प्यार करने वाला पति है, मेरी तरह इसे अकेलापन काटने नहीं दौड़ता। बच्चे, पति और परिवार, कितनी सेट लाइफ है। यहां आप को शादी के लड्डू जो खाए, वह भी पछताए और जो न खाए वह भी पछताए वाली कहावत याद आ रही होगी। एक के पास प्यार है, परिवार है तो उसका मन फ्रीडम के लिए तरस रहा है। जबकि दूसरी के पास पैसा है, भरपूर आजादी है तो उसका मन सच्चे प्यार और परिवार के लिए तरस रहा है। देखा जाए तो अधूरापन तो दोनों ओर है। जिस तरह शुरू में कहा गया है कि आधे गिलास खाली वाली मानसिकता तो लगभग हर किसी की रहनी ही है। इसमें महिलाओं में यह बात सब से अधिक देखने को मिलती है। खास कर एक उम्र के बाद महिला अगर स्वीकारभाव की अवहेलना करे तो उसके अंदर अधूरेपन की भावना इतनी जटिलता से घर कर जाती है कि वह उसे अनेक तरह की मानसिक और शारीरिक समस्या तक ले जाती है। हर किसी के जीवन के पड़ाव में तीस से चालीस साल का समयकाल ऐसा होता है कि जो समय उसके जीवन में अनेक बदलाव ले आता है। इस बदलाव को सहजता और सकारात्मकता से स्वीकार करना ही ठीक है, क्योंकि अगर इस बदलाव को आप स्वीकार नहीं कर सकीं और पहले जैसा आप का जीवन था, उसी तरह जीवन जीने की हठ पकड़े रहीं तो आप को मानसिक समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

 बदलाव को स्वीकार करना सीखें

टीनएज अथवा जवानी में आप अक्सर यह सोचती हैं कि यह समय कभी नहीं जाना चाहिए। मोस्ट प्रोबेब्ली आप इस लाइफ को सब से अधिक अच्छी तरह जीती हैं। यह समय आप को जीवन का सही स्ट्रगल क्या है, इससे रूबरू नहीं होतीं, इसलिए मौजमस्ती, घूमना-फिरना आप का जीवन होता है। पर यही जीवन हमेशा नहीं रहने वाला। एक समय आएगा जब आप को मौजमस्ती को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना होगा। आप को जिम्मेदारियों को स्वीकार करना सीखना पड़ेगा। अगर इन्हें नहीं स्वीकार किया तो मानसिक द्वंद्व और संताप का अनुभव करेंगी। उम्र का हर पड़ाव एक जैसा नहीं होता। हर पड़ाव पर बदलाव आता ही रहता है। इसे स्वीकार करना ही समझदारी है। इसे न स्वीकार कर के आप पहले जिस तरह जी हैं, उस तरह जीने की कोशिश करेंगी तो तकलीफ तो होगी ही।

जीवन का नया पड़ाव

कालेज का समय और उसके बाद के दो साल जीवन के सर्वश्रेष्ठ साल होते हैं। इसके बाद युवतियां शादी के सपने देखने लगती हैं। विवाह यानी परीकथा यह मान कर बैठने वाली लोगों के लिए विवाह यानी साज-श्रंगार, रोमांटिक हनीमून, परफेक्ट फेरीटेल समान विवाह और हनीमून के बाद जो जीवन शुरू होता है, वही सच्चा वैवाहिक जीवन। यह भी कह सकते हैं कि इसके बाद आप का नवजीवन शुरू होता है। इसके बाद जीवन के लक्ष्य बदलते हैं, जीवन जीने की रीति बदलती है, एक समय दोस्तों से भरा आप का दोस्तों का समूह अब छोटा हो कर कुछ खास मित्रों तक ही सीमित रह जाता है। अब मैं और मेरा जीवन यह मंत्र ऊपर चढ़ा देने का समय शुरू होता है। अब आप को जीवन पूरी तरह परिवार को देना होता है। आप के जीवन में आया नया व्यक्ति और उसके साथ जुड़े लोगों को समर्पित करना होता है। अगर आप इस बदलाव को धैर्य से स्वीकार नहीं कर सकतीं तो फेरिटल जैसे विवाह में समस्या खड़ी होने में देर नहीं लगती। यहां डराने का आशय नहीं, पर समय समय पर आप के जीवन में आने वाले मोड़ों को किस अभिगम से अपनाती हैं, यह समझने की बात है। समय समय पर लाइफ की प्रायोरिटी बदलती रहती है।

बदलाव का स्वीकार मैच्योरिटी बढ़ाएगा

समय समय पर बदलाव आते रहते हैं। इन बदलावों के स्वीकार से ही मैच्योरिटी बढ़ती है। इन बदलावों को स्वीकार करेंगी तो जीवन जीने में सहजता रहेगी और अधूरेपन का अनुभव करती रहेंगी तो जीवन को अच्छी तरह जी नहीं पाएंगीं। क्योंकि समय समय प्यार और आने वाले बदलाव की संभालना ही उचित है, इन बदलावों को स्वीकार कर के खुद को संभालेंगी तो जीवन को अधिक अच्छी तरह और खुशी से जी सकेंगी। समय किसी के लिए नहीं रुकता। आप को ही उसमें अनुकूलता साध कर उसमें खुद को, मन को ढ़ालना पड़ता है। इसलिए जीवन के हर पल को दोनों हाथ फैला कर अपनाएं, हर क्षण को खुशी से जीना सीखें, हर पल को पाना सीखें, अपने लिए समय निकालें, पर जिम्मेदारी से भी मत भागें।

About author

Sneha Singh
स्नेहा सिंह

जेड-436ए, सेक्टर-12
नोएडा-201301 (उ.प्र.)


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