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जीवन और परिवर्तन

जीवन और परिवर्तन गतिशीलता ही जीवन का जीवित होने का प्रमाण हैं।एक ही लय में तो गाना भी नहीं होता …


जीवन और परिवर्तन

गतिशीलता ही जीवन का जीवित होने का प्रमाण हैं।एक ही लय में तो गाना भी नहीं होता तो ये तो जीवन हैं,उसमे गति हैं तो परिवर्तन का होने भी स्वाभाविक हैं।परिवर्तन कभी सुखमय तो कभी दुःखमय होता हैं।सुख में खुश तो बहुत होते हैं हम और दुःख में दुःखी भी कम नहीं होते हैं हम।सुख जितनी प्रसन्नता से हम भोगते हैं उतनी ही धीरज से दुःख का सामना कर उसमें निकलने का रास्ता निकालना ही जीवन जीने की कला हैं। दुःख में ढह गए तो बिखरते देर नहीं लगती लेकिन हिम्मत से राह निकल पर उतरना चाहिए, रो कर बैठने वाले कभी दुःख से उबर नहीं सकतें,सिर्फ स्वयं को कोसने के स्व –दया( self pity) के अंतर्गत बेचारे बन रह जाते हैं। और बेचारगी को हमदर्दी से ज्यादा मूर्ख की उपाधि मिलती हैं।भोंदू समझा जाता हैं। दुनियां में हर आदमी सफल या सुखी नहीं होता हैं सब के जीवन में सुख और दुःख, ऊंच– नीच और धूप और छांव आते रहते हैं,क्या सुख, ऊंच और धूप को खुशी खुशी भुगतने वालों को दुःख, छांव और निवां समय आता हैं तो उससे पलायन करना नहीं चाहिए,जो एक मानसिक ,शारीरिक और आर्थिक पतन की और ले जा सकता हैं। हार मान लेना परिस्थितियों से, वह आसान रास्ता हैं किंतु सारी उमर के लिए प्रलाप करना पड़ता हैं।
परिवर्तन,आर्थिक,शारीरिक ,सामाजिक और मानसिक भी हो सकता हैं जिन से समझदारी से सामना कर निकलना ही हितावह होता हैं,और ये आपकी विपदा हैं और आपको ही पार उतरना पड़ेगा,सलाह सभी देंगे किंतु आपको ही उससे निबटना होगा,डूबने वालों को किनारे पर खड़ा व्यक्ति बचा नहीं सकता सिर्फ सूचनाएं दे सकता हैं।अगर परेशानी मानसिक हैं तो उसका सोच समझ के उपाय करना चाहिए,धैर्य से घरवालों की मदद ले रास्ता निकालना चाहिए।अगर जरूरत पड़े तो मानसिक निष्णांत से भी मदद ले सकते हैं।थोड़ा धर्म ध्यान में मन लगा,ध्यान में बैठ कर चित्त को शांत कर सकते हैं ।
कई बार कोई बीमारी जकड़ लेती हैं,जो आम वाकया हैं,कभी ऋतु बदलने से या खाने पीने में हुई त्रुटियों के चलते,या
या फैली हुई बीमारियों की वजह से या कोई वजह से शारीरिक तकलीफ हो तब भी योग्य सारवार और आहार से ठीक हुआ जा सकता हैं,किंतु उसके ठीक होने तक धीरज से अपनी दवाई और आहार का नियमन करना आवश्यक हो जाता हैं।शारीरिक तकलीफ को अपनी मानसिकता पर हावी नहीं होने देना चाहिए,क्योंकि शारीरिक तकलीफ तो ठीक हो जाएंगी किंतु मानसिक तकलीफ दूर करना काफी मुश्किल काम हो जायेगा।
सामाजिक परिस्थितियां और उलझाने वाली होती हैं,कई बार तो अनजाने में कही हुई बात से भी उत्पन्न हो जाती हैं।लोग कहते हैं ,”समाज से मुझे क्या लेना देना वह मेरा घर थोड़े ही चलाने आता हैं?” लेकिन समय आने पर उसी समाज का सामना करना पड़ता हैं, उलझी हुई गुत्थी को व्यवहार कुशल हो सुलझाना पड़ता हैं।आदमी एक सामाजिक प्राणी हैं तो समाज से डर कर नहीं किंतु अनुकूलन से रहना जरूरी हैं।
आर्थिक नुकसान भी बंदे को तोड़ के रख देता हैं,हताशा की और ले जाता हैं। आजकल महामारी की वजह से कई लोगों की नौकरियां छूट गई,व्यापार में घाटा आदि समस्याएं आम बात हो गई हैं।समर्थ आदमी को आर्थिक नुकसान भुगतना बहुत मुश्किल होता हैं लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग को तो इसकी आदत होने से मानसिक असर कम ही होती हैं।अगर व्यवसाय में घटा हो तो काफ़ी आर्थिक सहाय बैंक से भी ली जा सकती हैं,और कई सरकारी योजनाएं भी होती हैं जो मदद करती हैं।किंतु इस परिस्थिति का मानसिक प्रतिघात बहुत ही घातक होता हैं तो इसे खूब संभाल के अयोजनपूर्वक हल लाना चाहिए,जमा किए धन का उपयोग कर ,या दूसरे व्यवसाय में स्थानांतर कर रास्ता निकाला जा सकता हैं।
आर्थिक तब्दीली से टूटना या बिखरना पूरे परिवार को बर्बाद कर सकता हैं,धैर्य
और साहस से ,एक दूसरे के साथ से ही हर मुश्किल का हल ही सही रास्ता हैं।

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जयश्री बिरमी सेवानिवृत शिक्षिका  अहमदाबाद
जयश्री बिरमी
सेवानिवृत शिक्षिका 
अहमदाबाद

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