Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

lekh, Priyanka_saurabh

जातिवाद का मटका कब फूटकर बिखरेगा?

 जातिवाद का मटका कब फूटकर बिखरेगा?   इस देश में दो मराठी महापुरुष आये। दोनों ने देश पर इतना उपकार किया …


 जातिवाद का मटका कब फूटकर बिखरेगा?  

इस देश में दो मराठी महापुरुष आये। दोनों ने देश पर इतना उपकार किया कि ये देश उनका उपकार नहीं भुला सकता। एक ने धर्म कि रक्षा कि छत्रपति शिवाजी महाराज और उनका धर्म था इन्सानियत। दूसरे ने देश को रास्ता बताया भारतीय संविधान लिखकर। हम इन दोनों से कब सीखेंगे? 75 साल पहले हमें अंग्रेजी हुकूमत से आजादी तो मिली लेकिन 75 साल बाद भी जातिवाद से नहीं मिली आजादी। जब तक भारतीय समाज और राज्य को संचालित करने वाले केंद्रों-संस्थाओं पर से वर्ण-जाति की विचारधारा के लोगों का कब्जा खत्म नहीं होता है, तब इंद्र मेघवाल अपमानित होते रहेंगे और मारे जाते रहेंगे, बस वजहें अलग-अलग होंगी।

-प्रियंका ‘सौरभ’

भारतीय लोकतंत्र का मूल्य संविधान में निहित है और संविधान छुआछूत तथा अस्पृश्यता का निषेध करता है। फिर स्कूल के घड़े में रखा पानी पीने पर दलित बच्चों की क्रूरता से पिटाई क्यों? मासूम बच्चे को अभी पता भी नहीं था कि जाति क्या है और वह जातिगत छुआछूत प्रताड़ना का शिकार हो गया। आखिर हम और समाज मटके से कब आजाद होंगे? राजस्थान  में तीसरी कक्षा के विद्यार्थी नौ वर्षीय इंद्र मेघवाल की हत्या हमारे उन सब गर्वों पर कलंक है जिनका बखान हम धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिकता के नाम पर करते हैं। ऊँच- नीच को भगवान की देन बता-बता कर, सामाजिक नियंत्रण और डर फैलाना एक प्राचीनतम मनोवैज्ञानिक-सामाजिक हथियार है। भारत की ग़ुलामी के इतिहास में झांके तो हम पाएंगे कि धर्म का समर्थन प्राप्त जातिवादी मानसिकता भारत की गुलामी और हार का सबसे बड़ा कारण है। अगर किसी भी समाज को गुलाम बनाने की सामुदायिक-सांस्कृतिक लत है तो स्वतंत्रता का ढोंग क्यों हो ? सरस्वती मंदिर में अस्पृश्यता की बीमार परम्परा के प्रहार से घायल इंद्र मेघवाल की मौत क्या दिखाती है?

ऐसे संवेनदशील मामलों में सिर्फ शिक्षक के विरुद्ध कार्यवाही पर्याप्त नहीं है इसके लिए शिक्षण संस्थान भी जिम्मेदार बनते है जो ऐसे जातिवादी इलाकों में स्कूल में मटका रखने की अनुमति देते हैं  इसलिए ऐसे शिक्षण संस्थाओं को इनका तोड़ ढूंढना होगा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता  का अंत किया गया है और इसका किसी भी रूप में पालन करना अपराध घोषित किया गया है। इसलिए राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि उसके क्षेत्र में किसी प्रकार का छुआछूत प्रैक्टिस में ना रहे। इस देश में दो मराठी महापुरुष आये। दोनों ने देश पर इतना उपकार किया कि ये देश उनका उपकार नहीं भुला सकता। एक ने धर्म की रक्षा की छत्रपति शिवाजी महाराज और उनका धर्म था इन्सानियत।  दूसरे ने देश को रास्ता बताया भारतीय संविधान लिखकर। हम इन दोनों से कब सीखेंगे? 75 साल पहले हमें अंग्रेजी हुकूमत से आजादी तो मिली लेकिन 75 साल बाद भी जातिवाद से नहीं।

 पहले अस्पृश्पृयता बहुत ज्यादा थी, जो आज के दौर मे कही -कहीं दिखाई देती है। ऊंच-नीच, छुआछुत के कारण पहले  ऊँची जाति के लोग (खासकर ब्राह्मण,बनिये) नीची जाति के लोगों के पास से निकलते हुये निश्चित दूरी  बनाकर निकलते थे और किसी चीज के लेन-देन के वक़्त हाथों मे एक निश्चित फासला रखते थे। मगर ऐसी बातें सुनकर हँसी तब आती है जब कोई नीची जाति का आदमी बनिये की दुकान से कुछ खरीदने जाता तो बनिया उसके हाथ से पैसे लेते वक़्त कोई फासला नहीं रखता लेकिन उसके बदले समान देते वक़्त फासला बना लेता। तो फिर अछूत कौन हुआ ? सोचिये। अब वक़्त ने करवट बदली है, बिजली पानी मे कुछ सरकारी दखलंदाज़ी होने से अब पानी खींचना नहीं पड़ता। गाँव में नीची जाति के लोग आज बे- धडक अंदर आ जाते हैं और पास रखी कुर्सी या स्टूल पे धडल्ले से बैठ जाते हैं। हाथ मिलाना, साथ चलना तो आम हो गया। कुए की जगह अब पानी की टंकियाँ बनी है जिसमे नल लगे हैं मगर अब उन नलों का जाति के हिसाब से बंटवारा नहीं किया गया। ये सामाजिक बदलाव की पहल वक़्त ने की है, न की किसी जाति विशेष ने।

देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, वहीं दूसरी तरफ पानी के मटके को छूने पर मासूम को इतना पीटा गया कि जान ही चली गयी। 15 अगस्त 1947 को भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली थी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विपरीत, लोग सभी प्रकार के भेदभाव से मुक्त सम्मानजनक जीवन जीने की आशा रखते थे। हालाँकि अब उत्पीड़कों ने केवल अपना रूप बदल लिया है। कौन नहीं जानता कि आज भी स्कूलों में मिड डे मील को दलित बच्चे छू लेते हैं तो लोग कहते हैं हमारे बच्चों को दीन हीन कर दिया। हम आये दिन कहीं न कहीं ये पढ़ते है कि मिड-डे मील के बचे हुए खाने को स्कूल के पड़ोस में रहने वालों ने सिर्फ इसलिए नहीं लिया क्योंकि खाना देने दलित बच्चे गये थे। प्रगतिशील राज्यों में से एक होने और सामाजिक न्याय का दावा करने वाले तमिलनाडु अस्पृश्यता उन्मूलन मोर्चा के सर्वे में खुलासा हुआ है कि 386 पंचायतों में से 22 में दलित ग्राम प्रधानों को बैठने तक के लिए कुर्सी नसीब नहीं होती। ऐसे में बिना भेदभाव खत्म हुए  किसी भी आजादी का कोई मतलब नहीं है।

इंद्र कि मौत के इस जघन्य कृत्य के लिए हम सब शर्मिंदा है। 75 साल हो गए पर देश के कुछ ऐसे नीच बुद्धि वाले लोग है जो अपने आप को भगवान समझते हैं और देश के आज़ाद होने के बाद भी ऐसी नीच मानसिकता रखते हैं। जब तक ऐसे लोग रहेंगे देश कभी आज़ाद नही रहेगा। मासूम बच्चे ने सोचा कि जब आजादी के अमृत महोत्सव का ढोल पूरे देश में जोर शोर से पीटा जा रहा है तो शायद मैं भी आजाद हूँ। उसे क्या पता था की ये आजादी उसके लिए नही। वह अबोध बालक हजारों प्रश्न देश के सामने छोडकर आज चला गया। समाज और देश के असली दुश्मन तो इस तरह की मानसिकता वाले लोग हैं जो एक शिक्षक जैसे आदर्श व्यक्तित्व के रूप में स्कूल का संचालन कर रहे हैं। ऐसे में सरकार को निजी स्कूलों के लिए भी कुछ चारित्रिक मापदंड अनिवार्य करना चाहिए।

जब तक भारतीय समाज और राज्य को संचालित करने वाले केंद्रों-संस्थाओं पर से वर्ण-जाति की विचारधारा के लोगों का कब्जा खत्म नहीं होता है, तब इंद्र मेघवाल अपमानित होते रहेंगे और मारे जाते रहेंगे, बस वजहें अलग-अलग होंगी। वर्ण-जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने वाली बहुजन वैचारिकी और बहुजन नायकों को भारतीय समाज के केंद्र में स्थापित किए बिना डॉ. आंबेडकर से लेकर इंद्र मेघवाल तक को पानी का घड़ा छूने के लिए दंडित करने की परंपरा को खत्म नहीं किया जा सकता है। यह प्रतिकार सिर्फ इंद्र मेघवाल की हत्या तक सीमित नहीं होना चाहिए। हजारों सालों की ऊंच-नीच की भेदभाव भरी व्यवस्था के खिलाफ होना चाहिए।

About author 

प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

facebook – https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/

twitter- https://twitter.com/pari_saurabh


Related Posts

हर देशवासी के दिल में है ‘शहीदों के राजकुमार’ भगत सिंह

March 23, 2023

(क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है) हर देशवासी के दिल में है ‘शहीदों के राजकुमार’ भगत

सांस्कृतिक और संस्कारिक एकता के मूल आधार है हमारे सामाजिक त्यौहार।

March 23, 2023

सांस्कृतिक और संस्कारिक एकता के मूल आधार है हमारे सामाजिक त्यौहार। हिंदुस्तान त्योहारों का देश है। त्योहार हमको सामाजिक और

मोहि मिलो गुर सतगुरु पूरा

March 22, 2023

मोहि मिलो गुर सतगुरु पूरा अति सुखकारक और दुखहरन है पूरण सतगुरु श्रीदर्शन गोंदिया – सृष्टि की पृथ्वी धरा पर

अंतरराष्ट्रीय झूलेलाल जयंती चेट्रीचंड्र महोत्सव 23 मार्च 2023 पर विशेष

March 22, 2023

अंतरराष्ट्रीय झूलेलाल जयंती चेट्रीचंड्र महोत्सव 23 मार्च 2023 पर विशेष धार्मिक आस्था का प्रतीक – चेट्रीचंड्र पर्व भारत सहित अंतरराष्ट्रीय

फेक न्यूज और दुष्प्रचार भारतीय समाज में नई चुनौतियाँ

March 22, 2023

फेक न्यूज और दुष्प्रचार भारतीय समाज में नई चुनौतियाँ हर किसी की यह जिम्मेदारी है कि वह फेक न्यूज और

अब हमारी आदत ही पानी बचा सकती है।* (22 मार्च जल दिवस विशेष)

March 22, 2023

अब हमारी आदत ही पानी बचा सकती है।(22 मार्च जल दिवस विशेष) जल से जीवन है जुड़ा, बूँद-बूँद में सीखनहीं

PreviousNext

Leave a Comment