चुपचाप देखते रहते हो| chupchap dekhte rahte ho.
चुपचाप देखते रहते हो जाने कैसा दौर गुज़र रहा है ये , खुदा का घर दहशत में है जन्नत लिपटी …
Related Posts
वो ख्यालात मोहब्बत के
May 10, 2022
वो ख्यालात मोहब्बत के तेरे तसव्वुर ए ख्यालात में अकसर दिल खोता है एसा लगे चांदनी रात में चांद चांदनी
बंद कमरों की घुटन-सुधीर श्रीवास्तव
May 9, 2022
बंद कमरों की घुटन आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने खुद ही खुद को कैद कर लिया है कंक्रीट के
कविता डिजिटल भारत मेक इन इंडिया
May 9, 2022
कविता डिजिटल भारत मेक इन इंडिया रचनात्मक नवाचार से जुड़ा विज्ञान आम आदमी के लिए जीवन में सहजता लाता है
शोहरतों का परचम- सुधीर श्रीवास्तव
May 9, 2022
शोहरतों का परचम शोहरतों के परचम लहराने का गर इरादा है तो कुछ ऐसा कीजिए जो अलग हो औरों से
ज़िंदगी- सुधीर श्रीवास्तव
May 9, 2022
ज़िंदगी वाह री जिंदगी तू भी कितनी अजीब जाने क्या क्या गुल खिलाती है कभी हंसाती, कभी रुलाती है और
कविता – ख्वाब – सिद्धार्थ गोरखपुरी
May 9, 2022
कविता – ख्वाब ये ख्वाब न होते तो क्या होता? झोपड़ी में रहने वाले लोग जब थोड़े व्यथित हो जाते
.jpg)