Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Dr_Madhvi_Borse, poem

चालाक लोमड़ी

 चालाक लोमड़ी! भरी दोपहर में एक दिन लोमड़ी भटके, कर रही थी भोजन की तलाश, दिखे उसे बेल में अंगूर …


 चालाक लोमड़ी!

डॉ. माध्वी बोरसे!

भरी दोपहर में एक दिन लोमड़ी भटके,

कर रही थी भोजन की तलाश,

दिखे उसे बेल में अंगूर लटके,

किया उसे तोड़ने का प्रयास!

लालची लोमड़ी कहने लगी स्वयं से,

इन स्वादिष्ट अंगूर को मुझे है खाना,

लगाई उसने छलांग जम जम के,

थक हार के बैठी और किया बहाना!

उसने अपने मन को समझाया,

बहुत ऊंचाई पर है,इसमें मेरा क्या कसूर,

अपनी कमजोरी को छुपाया,

और कहां, यह तो अंगूर खट्टे होंगे जरूर!

अगर हम कुछ प्राप्त ना कर पाए, कीमती वस्तु को तुच्छ साबित ना करें,

जीवन में परिश्रम करते जाए,

रहे आखरी तक अपने लक्ष्य पर अड़े!!

डॉ. माध्वी बोरसे!

(स्वरचित व मौलिक रचना)

राजस्थान (रावतभाटा)


Related Posts

व्यंग्य धरती को मरने दो

June 24, 2022

 व्यंग्यधरती को मरने दो सुधीर श्रीवास्तव धरती उपज को रही तो खोने दो धरती मर रही है मरने दो। बहुत

जब तक है जिंदगी

June 24, 2022

 जब तक है जिंदगी सुधीर श्रीवास्तव जिंदगी जब तक है गतिमान रहती है, न ठहरती है,न विश्राम करती है। सुख

क्या लेकर आया है जो ले जायेगा

June 24, 2022

 क्या लेकर आया है जो ले जायेगा सुधीर श्रीवास्तव यह कैसी विडम्बना है कि हम सब जानते हैं मगर मानते

अनंत यात्रा

June 24, 2022

 अनंत यात्रा सुधीर श्रीवास्तव शून्य से शिखर तक जीवन की गतिमान यात्रा खुद को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर होने का दंभ

कदम

June 24, 2022

 कदम सुधीर श्रीवास्तव हमें लगता है कि हमारे कदम किसी और को  प्रभावित नहीं करते , पर सच तो यह

व्यंग्य स्वार्थ के घोड़े

June 24, 2022

 व्यंग्यस्वार्थ के घोड़े सुधीर श्रीवास्तव आजकल का यही जमाना अंधे को दर्पण दिखलाना, बेंच देते गंजे को कंघा देखो! कैसा

PreviousNext

Leave a Comment