Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

खिड़की का खुला रुख

मैं औरों जैसा नहीं हूँ आज भी खुला रखता हूँ अपने घर की खिड़की कि शायद कोई गोरैया आए यहाँ …


मैं औरों जैसा नहीं हूँ
आज भी खुला रखता हूँ
अपने घर की खिड़की
कि शायद कोई गोरैया आए
यहाँ अपना घोंसला बनाए।

मैं महसूस करना चाहता हूँ
वो सुन्दर बीते हुए पल
जब चिड़ियाँ अपनी चहचहाहट में
भर देती थीं दिनभर खुशियाँ
ना कोई तनाव, ना ईर्ष्या, घृणा
हर ओर शान्ति की छाया थी।

अब वो सब कुछ खो गया
जैसे खिड़की का घोंसला भी
उजड़ गया, टूट गया।

मैं फिर से पाना चाहता हूँ
वो सुनहरा समय
इसीलिए आज भी
खुली रखता हूँ अपनी खिड़की।

-प्रतीक झा ‘ओप्पी’ (उत्तर प्रदेश)


Related Posts

ए-जमीन-ए-वतन ,ए-ज़मीन-ए-वतन -मईनुदीन कोहरी”नाचीज़ बीकानेरी”

January 25, 2022

ए-जमीन-ए-वतन ,ए-ज़मीन-ए-वतन । ए-जमीन-ए-वतन ,ए-ज़मीन-ए-वतन ।तुझको मेरा नमन , तुझको मेरा नमन ।। आबरू तेरी जाने नां देंगें कभी ।

दे दो दर की नौकरी सतगुरु जी एक बार

January 24, 2022

भज़नदे दो दर की नौकरी सतगुरु जी एक बार दे दो दर की नौकरी सतगुरु जी एक बार बस इतनी

गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में…

January 24, 2022

गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में…. नन्हीं कड़ी में…. आज की बात जीना चाहता हूँ… (कविता…) मैं भी किसी के आँख का तारा

हिंदू राष्ट्र-दीप मदिरा

January 24, 2022

हिंदू राष्ट्र मैं हिंदू राष्ट्र का समर्थक हूं। अगर तुम देने को तैयार हो समानताकिसी को नहीं बता रहे हो

आगे बढ़ते हैं!-डॉ. माध्वी बोरसे!

January 24, 2022

आगे बढ़ते हैं! वक्त बीत गया, समा बदल गया, चलो सब भूल कर आगे बढ़ते हैं,दिल में लाए दया,अब और

यही कुछ फर्क है!- डॉ. माध्वी बोरसे!

January 24, 2022

यही कुछ फर्क है! जब नहीं था हमारे पास अलार्म, स्वयं से याद रखते थे सारे काम,ना था मोबाइल फोन

Leave a Comment