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क्रोध विकराल परिस्थितियों का जन्मदाता!!

 क्रोध विकराल परिस्थितियों का जन्मदाता!!  हमारा गुस्सा और क्रोध हमारे जीवन की सभी समस्याओं की वजह में से एक है  …


 क्रोध विकराल परिस्थितियों का जन्मदाता!!

 हमारा गुस्सा और क्रोध हमारे जीवन की सभी समस्याओं की वजह में से एक है 

एड किशन भावनानी

हर बात और स्थिति को अत्यंत सहजता में लेना ही गुस्से और क्रोध पर नियंत्रण का मूल मंत्र हैं- एड किशन भावनानी

गोंदिया- आज के युग में हर व्यक्ति को जीवन के किसी न किसी पड़ाव में विपरीत परिस्थितियों का निर्माण होने के कारणों में कहीं ना कहीं एक कारण उसका गुस्सा या क्रोध भी होगा। अगर हम अत्यंत संवेदनशीलता और गहनता से उत्पन्न हुई उन परिस्थितियों की गहनता से जांच करेंगे तो हमें जरूर यह कारण महसूस होगा। गुस्से और क्रोध का वह छोटा सा पल ऐसी अनेकों विकराल स्थितियों और परिस्थितियों को पैदा कर देता है, जिसकी हमें उम्मीद भी नहीं रहती और फिर बड़े बुजुर्ग लोग कहते हैं ना कि, जब चिड़िया चुग गई खेत अब पछतावे का होए।बस हमें उस गुस्से क्रोध के उस पल को काबू में रखने के मंत्र सीखने होंगे जो कि आसान है। सबसे पहले तो हमारी यह सव प्रतिशत कोशिश होनी चाहिए कि उस स्थिति को पैदा ही ना होने दें , जिसके कारण क्रोध या गुस्सा या आक्रोश उत्पन्न हो।परंतु यह भी उचित बात है कि, हम किसी भी परिस्थिति को कितना भी रोके, परंतु स्थिति उत्पन्न हो ही जाती है,या अन्य कोई यह स्थिति उत्पन्न कर ही देता है, तो ऐसी परिस्थिति में सबसे सरल मंत्र है उस परिस्थिति की हर बात,हर स्थिति को अत्यंत ही सहजता और सरलता से लें और गुस्से या क्रोध या आक्रोश को जगने से पहले ही तुरंत उसे समाप्त कर दें। उसके लिए सहजता व सरलता इन दो शब्दों या मंत्रों को गांठ बांध के रखना ही होगा। 

साथियों ,मेरा ऐसा निजी मानना है कि जितनी भी विपरीत, हानिकारक, कष्टदाई परिस्थितियां उत्पन्न होती है, उसका मूल कारण गुस्सा, आक्रोश, क्रोध में उठाया गया हिंसात्मक कदम होता है, जिसकी परिणीति में उन विपरीत परिस्थितियों का जन्म होता है।और अगर उन परिस्थितियों, स्थितियों को फलने फूलने के लिए, कथित प्रोत्साहन मिला तो फिर विकराल रूप बन इंसान को सबसे बड़ा और खतरनाक प्राणी बना देता है ,जिसे आज की स्थिति में अपराध के जगत का डॉन या कुख्यात अपराधी की संज्ञा दी जाती है।साथियों, हम अपने रूटीन जीवन के हर क्षण में काफी नजदीकी से देखते होंगे कि कोई भी टॉपिक में, किसी भी क्षेत्र में, किसी भी विषय में, बात तभी बिगड़ जाती है जब वहां तावबाज़ी अर्थात गुस्सा या क्रोध का जन्म होता है, और बात बढ़ कर कहासुनी, मारपीट, हत्या की कोशिश, हत्या, जख्मी, घायल इत्यादि से पुलिस, जेल , और मामला अदालतों की दहलीज तक जा पहुंचती है। और सामाजिक-आर्थिक नैतिक, हानि, मानहानि अलग होती है। साथियों, सोचिए इतनी भारी कीमत चुकानी होती है, मात्र एक छोटे से पल की जिस पर आसानी से नियंत्रण किया जा सकता था। जो भी व्यक्ति उपरोक्त विपरीत प्रक्रिया, गुस्से, क्रोध, से जेल तक में बंदी बनाया जाता है या सजा काटता है या अदालतों के चक्कर काटता है, विशेषज्ञों और अधिवक्ताओं के पीछे घूमता है, अगर हम उसकी प्रतिक्रिया जानना चाहेंगे तो हमें निर्णय करने में आसानी होगी कि मामला गुस्से और क्रोध की परिणीति का है और कहीं ना कहीं उस व्यक्ति के मन में गुस्से और क्रोध के प्रति पछतावे की बात सामने आती है। गुस्सा और क्रोध से, बदले की भावना का उदय होता है और फिर बदले पर बदला के चक्रव्यूह में अनेक जीवो का जीवन कुचक्र में फंस कर खराब हो जाता है। क्योंकि फिर बदले का अंजाम बहुत दूर तलक जाता है, जो गुटबाजी, गैंगवार सहित बात दूर तलक चली जाती है अतः अगर हम अपने क्रोध, गुस्से को काबू में कर पाएंगे तो सहजता और सरलता रूपी मिठास का अपने आप उदय होगा हम स्वाभाविक रूप से मीठा बोलेंगे। हमारी वाणी में मिठास उत्पन्न होगी। चार लोग हमारे करीब आएंगे,और हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी, मान सम्मान होगा। जिसका प्रभाव हमारी वर्तमान पीढ़ी, भावी पीढ़ी पर भी पड़ेगा क्योंकि बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि, बोया बीज बबूल का तो आम कहां से खाए, और बोया बीज मिठास का तो कुल पुरा मीठा होय। हम सामाजिक रुप में भी किसी व्यक्ति या परिवार को उसके कुल से ही कतारते हैं कि, अच्छे कुनबे का परिवार है या अच्छे कुनबे का व्यक्ति है। अतः सभी कुभावनाओं, विपरीत विचारों, परिस्थितियों, से ओतप्रोत इस गुस्से और क्रोध,आक्रोश को हीपूरी विपत्ति और कठिनाइयों की जड़ मानेंगे अतःउपरोक्त पूरे विवरण को अगर हम संकुचित और कुछ शब्दों या शब्दकोश में सीमित करें तो गुस्सा और क्रोध एक तेज तीखी मिर्ची के समान है ,एक आग के समान है,जिसे फैलने या रोकने के लिए सहजता और सरलता रूपी गुड़ शक्कर या शहद की जरूरत होती है, जो मिर्ची रूपी धास को, आग रूपी तबाही को, सहजता सरलता और मीठी वाणी रूपी पानी से बुझाया जा सके। अतः इंसान को हर बात और हर स्थिति को अत्यंत ही सहजता और सरलता में ही लेना चाहिए ताकि क्रोध और गुस्से पर नियंत्रण हो सके यही मूल मंत्र है।

-संकलनकर्ता-लेखक कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र


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