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क्यूँ न बच्चों को संस्कृति से परिचय करवाया जाए

“क्यूँ न बच्चों को संस्कृति से परिचय करवाया जाए” आजकल की पीढ़ी भौतिकवाद और आधुनिकता को अपनाते हुए अपने मूलत: …


“क्यूँ न बच्चों को संस्कृति से परिचय करवाया जाए”

क्यूँ न बच्चों को संस्कृति से परिचय करवाया जाए
आजकल की पीढ़ी भौतिकवाद और आधुनिकता को अपनाते हुए अपने मूलत: संस्कार, संस्कृति और परंपरा की अवहेलना कर रही है। नई पीढ़ी को परंपराएं चोंचले लगती है।
बड़े बुज़ुर्गों का आशिर्वाद लेना, त्योहार मनाना, या पारंपरिक तरीके से कोई रस्म निभाना आजकल के बच्चों को फालतू बातें लगती है। त्योहारों की छुट्टियों में घर पर रहकर परिवार के साथ पारंपरिक तरीके से त्योहार मनाने की बजाय हील स्टेशन या समुन्दर किनारे घूमने का प्लान बना लेते है। ये विचारधारा सामाजिक पतन की ओर इंगित करती है।
विभक्त परिवारों के चलते न अब दादा-दादी का लाड़ प्यार बच्चों को मिलता है, न पहले की तरह बच्चों को गायत्री मंत्र, त्रिकाल संध्या या कोई श्लोक सिखाए जाते है। आजकल एक साल का बच्चा भी मोबाइल का व्यसनी होता है, कार्टून दिखाओ तो ही खाना खाता है। ऐसे में भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान बच्चों को कहाँ से मिलेगी। हमारी संस्कृति और परंपरा एकता और अखंडता की मिसाल है। अगर बच्चों को संस्कृति से मुलाकात नहीं करवाएँगे तो आगे जाकर हमारा देश भी पाश्चात्य विचारों की धुरी पर चल निकलेगा।
विश्व में कई संस्कृतियों का उद्भव हुआ और समय के साथ विलीन भी हो गयी लेकिन भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन और श्रेष्ठ संस्कृति है। जिसकी धरोहर लौकिकता, भौतिकता और भोगवाद के बजाय आध्यात्मवाद और आत्मखोज की नींव पर खड़ी है। जिसका मूल लक्ष्य संस्कार, शान्ति, सहिष्णुता, एकता, सत्य, अहिंसा और सदाचरण जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना करके समस्त विश्व की आध्यात्मिक उन्नति करना है। इसमें सब के सुख के लिये, सबके हित में कार्य करने के उद्देश्य के साथ समस्त विश्व को अपना परिवार मानने की भावना होती है। और इसी भावना को बरकरार रखने के लिए आज हर अभिभावकों को अलख जगानी है। पहले के ज़माने में बच्चों को गुरुकुल में पढ़ने भेजते थे, जहाँ वैदिक और विज्ञान दोनों सिखाए जाते थे।
अपने सांस्कृतिक और जीवन मूल्यों के बल पर भारतीय संस्कृति हजारों वर्षों बाद भी अपने मूल रूवरूप में विद्यमान रहकर समग्र विश्व को आकर्षित कर रही है। हमारी संस्कृति आदर्श जीवन जीने और विश्व मानव को एक सूत्र में बाँधने की डोर है। सही मायनों में भारतीय संस्कृति मनुष्य जीवन को सार्थक करने का मूलमंत्र है। भारतीय संस्कृति की मान्यतायें और परम्परायें किसी न किसी वैज्ञानिक आधार पर प्रतिस्थापित है, जो आज के डिजिटल युग में भी पूर्णरूप से वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर तर्कसंगत है। हमारी संस्कृति में अनगिनत विशेषतायें भी है। बस भौतिकवाद के मलबे के नीचे दब कर रह गई है, जिसे खोदकर उजागर करने की जरूरत है।
भारतीय संस्कृति का महत्व यह है कि यह मानव मुक्ति और कल्याण की दिशा में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। किसी अन्य संस्कृति ने मनुष्य को इतनी गहराई और समझ से नहीं देखा जितना हमारी संस्कृति ने देखा है। आजकल तो पाश्चात्य लोग भी हमारी संस्कृति और श्लोकों से प्रभावित होकर अपना रहे है। हरे राम हरे कृष्ण मिशन में ज़्यादातर विदेशी लोग ही दिखते है। हरिद्वार के कई आश्रमों में मन की शांति के लिए विदेशी लोग योग और श्लोकों से प्रभावित होकर महीनों रहते है और आत्म कल्याण का मार्ग अपनाते है। तो क्यूँ न व्यक्तित्व विकास के लिए, अपनी संस्कृति और परंपरा का सम्मान करते बच्चों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से परिचय करवाया जाए।

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bhawna thaker
भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर

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