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कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

आओ अपने पुराने दिनों को याद करें  कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन  वर्तमान प्रौद्योगिकी युग में भी मनीषियों …


आओ अपने पुराने दिनों को याद करें 

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन 

वर्तमान प्रौद्योगिकी युग में भी मनीषियों द्वारा अपने पुराने दिनों को अच्छे दिन बताने को रेखांकित कर सकारात्मक उपायों पर मंथन करना जरूरी – एडवोकेट किशन भावनानी

गोंदिया – वर्ष 1964 में दूर गगन की छांव में फिल्म का गीत कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन सुनकर आज कई बड़े बुजुर्ग, विपत्ति पीड़ितों, दुखियारों की आंखों में आंसू आ जाते हैं और अपने बीते हुए दिनों की यादों में खो जाते हैं जो रेखांकित करने वाली बात है जिसपर हमारे आज के युवा राष्ट्र के युवाओं को इस पर मंथन करने की जरूरत है कि आखिर क्यों? वर्तमान प्रौद्योगिकी युग में भी मनीषियों द्वारा अपने पुराने दिनों को अच्छे दिन बताया जाता है। हालांकि यह गीत 1964 का है याने आज से 58 वर्ष पूर्व भी उस समय के बुजुर्गों के भाव ऐसे थे याने जैसे जैसे समय का चक्र अपनी तेज रफ्तार से चल रहा है, हर स्थिति को बदलता जा रहा है, विज्ञान प्रौद्योगिकी डिजिटलाइजेशन में तीव्रता से विकास स्वभाविक और समय की मांग है, परंतु आज माता-पिता बेटा-बेटी भाई-बहन संयुक्त परिवार से एकल परिवार और एकल परिवार में भी बहुत खटास के बढ़ते जाने को रेखांकित कर आज हर व्यक्ति को अपने आपसे प्रश्न पूछने को की जरूरत है कि क्यों उसे बीते हुए सुहाने दिनों की लालसा है? क्यों नहीं अपने स्वभाव में,जीवन शैली मेंपरिवर्तन लाकर खुद और परिवार के बीते हुए दिनों की मिठास ला सकते हैं। आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से रिश्तों में मिठास लाकर अपने बीते हुए दिनों को लौटाने पर,खुशहाल करने पर चर्चा करेंगे। 
साथियों बात अगर हम पुराने दिनों की यादों की करें तो इसकी शुरुआत हम बचपन के दिनों से करते हैं, मेरा मानना है कि सबको अपने बचपन के दिनों में अधिक सुकून मिला होगा, हर किसी को अपना बचपन याद आता है। हम सबने अपने बचपन को जीया है। शायद ही कोई होगा, जिसे अपना बचपन याद न आता हो। बचपन की अपनी मधुर यादों में माता पिता,भाई-बहन, यार-दोस्त, स्कूल के दिन, आम के पेड़ पर चढ़कर ‘चोरी से’ आम खाना, खेत से गन्ना उखाड़कर चूसना और ‍खेत मालिक के आने पर ‘नौ दो ग्यारह’ हो जाना हर किसी को याद है। चोरी और ‍चिरौरी तथा पकड़े जाने पर साफ झूठ बोलना बचपन की यादों में शुमार है। बचपन से पचपन तक यादों का अनोखा संसार है। 
साथियों, छुटपन में धूल-गारे में खेलना, मिट्टी मुंह पर लगाना, मिट्टी खाना किसे नहीं याद है? और किसे यह याद नहीं है कि इसके बाद मां की प्यारभरी डांट-फटकार व रुंआसे होने पर मां का प्यारभरा स्पर्श! इन शैतानीभरी बातों से लबरेज है सारा बचपन।इसलिए पुराने दिनों की याद कर आज भी हम कहते हैं, हम भी अगर बच्चे होते,हम भी अगर बच्चे होते, नाम हमारा होता गबलू-बबलू, खाने को मिलते लड्डू,और दुनिया कहती हैप्पी बर्थडे टू यू’,।
साथियों बात अगर हम अपने युवापन के यादों की करें तो हमारे रिश्तो में कुछ और रिश्तो की कड़ियां जुड़ी, हमें माँ बाप भाई बहन पति पत्नी सास ससुर न जाने कितने रिश्तों में जोडा है ये रिश्ते आसानी से जुड़ गए, जिससे बचपन की अपेक्षा स्थिति कुछ कठिन हुईरिश्तो में अपेक्षाकृत प्यार कम होता चला गया, लेकिन अब हम इन्हें कैसे बनाते है ।अच्छा या बुरा ,मजबूत या कमजोर ये हम पर निर्भर करता है और हर रिश्ताभावनाओ और आपसी समझ से एक दूसरे को जोड़ता है। और इन्हें प्यार के रिश्ते कहते है। और जो रिश्ता प्यार का और भावनाओ का बनता है उन्हें तोडना भी भुत मुश्किल है। और जिन रिश्तों में प्यार और भावनाये नही है वो शायद समाज के आगे दिखावे के लिए जुड़े भी रहे लेकिन दिल में ज्यादा दिन तक रहते है। अब जैसे पति और पत्नी दोनों एक दूसरे के लिए अनजान है और न ही इनका खून का रिश्ता होता है। फिर भी ये एक दूसरे के लिए बहुत खास होते है क्यों की इनका प्यार और आपसी समझ और भावनाये इन्हें हमेसा जोड़े रखती है। और कहीं कहीं खून के रिश्ते भी कमजोर पड़ जाते है। जैसे भाई भाई की नहीं बनती भाई बहन की नही बनती पति पत्नी की नहीं बनती। 
साथियों बात अगर हम समय के साथ बदलते चक्र में रिश्तो को निभाने की करें तो, सहनशीलता, विश्वासआपसी प्रेमरिश्तों को निभाने के लिए सहनशीलता और धैर्य बहुत आवश्यक है, हर रिश्ता बलिदान मांगता है, चाहे वो पति पत्नी का हो, या बहन भाई का या सास बहू का, अगर हम सबंधो को मधुर रखना है पुराने बीते हुए दिन वापस लाना है तो बहुत सी बातों को नजरअंदाज करना पड़ेगा, धैर्य रखना पड़ेगा और समय पड़ने पर बलिदान भी देना होगा चाहे वो गर्मी की रात में बिना कूलर के सोना हो, या जून की दोपहर में भाई के बच्चे को स्कूल से लाना हो एक दूसरे पर विश्वास, और सम्मान दूसरे सबसे महत्वपूर्ण कारण हैं जो आपसी संबंधों में मधुरता बरक़रार रखेंगे।परिवार एकता के सूत्र में बंधा रहे उसके लिए बचपन से ही घर के तमाम सदस्यों में एक दूसरे का सम्मान और परस्पर प्रेम की भावना विकसित करना भी बेहद आवश्यक है। 
साथियों बात अगर हम वर्तमान परिपेक्ष में पुराने रिश्तों के सुकून भरे दिनों और वर्तमान रिश्तो की करें तो हम जरूर पुराने दिनों की बहुत याद आएगी क्योंकि आज प्यार भावना मान-सम्मान सहनशीलता संवेदनशीलता अपेक्षाकृत कम है इसलिए, रिश्तों में खटास आई, यह तब ही आती है जब हम ज्यादा स्वार्थी और अभिमानी बनने लगते है तो सबसे पहले अपने आप में सुधार करें ।दुसरे की भावनाओ की कद्र करना सीखें ।थोड़ा लेट-गो करें क्योंकि गलतीयां हर किसीसे होती ही है ।अपनी लेंग्वेज को सुधारे क्योंकि हम जैसे बोलते है वैसा ही प्रभाव सामनेवाले व्यक्ति पर पडता है इसलिए अपने बोलने के ढंग को मोहक और मीठा बनाए।सामने वाले की बुराईयों की जगह उनकी अच्छाइयों पर ज्यादा ध्यान दें ।कभी कभार कोई अच्छा सा तोहफा देकर रिश्ते में मिठास बढ़ाए ।अपने आप के कर्तव्यों को समजते हुए सामने वाले की केर करें हंमेशा कुछ भी अच्छा करने की शुरुआत खुद से ही करें ।और सबसे महत्वपूर्ण बात की अपनी गलती को स्वीकार करना सीखें और माफ़ी मांग लें ।अपने विचारों को संकुचित मत रखें , दिल से उदार बनें ।किसी भी बात का बिना सोचे समझे उतर न दें मतलब की अपने गुस्से को काबू करना सीखें क्योंकि समय आने पर सब कुछ सही हो जाता है ।अगर किसीने गुस्से से कभी कुछ सुना दिया हो तो उसको दील पे मत ले और माफ करना सीखें । अगर बात ज्यादा बढ गई हो तो थोडे दिन के लिए सिर्फ उससे बात करना बंद कर दीजिये थोडे ही दिन में सबकुछ ठीक हो जाएगा ।भावनाए रिश्तों की जान होती है अतः अपनी अच्छी भावनाओ को हंमेशा व्यक्त करते रहे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे के आओ अपने पुराने रिश्तो को याद करें कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन वर्तमान प्रौद्योगिकी युग में भी मनीषियों द्वारा अपने पुराने दिनों को अच्छे दिन बताने को रेखांकित कर सकारात्मक उपायों पर मंथन करना जरूरी हैं। 

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Kishan sanmukh

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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