Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

कुएँ की खामोशी

मन करता है मैं उसी कुएँ से नहाऊँ, पानी भरूँ जहाँ कभी परिवार के सभी लोग हँसी के छींटों में …


मन करता है
मैं उसी कुएँ से नहाऊँ, पानी भरूँ
जहाँ कभी
परिवार के सभी लोग
हँसी के छींटों में
जीवन की छोटी-छोटी खुशियों में
लिप्त थे।

पर अब वही कुआँ
चुप्पी ओढ़े खड़ा है
उसके होंठों पर
घास और झाड़ियाँ उग आई हैं
और कदमों की आहट
बरसों से अब तक
लौटकर नहीं आई।

कुएँ तो आज भी वही हैं
पर परिवार
एक से टूटकर अनेक हो गया है।
और उस कुएँ के किनारे
अब
यादों की पतझड़ बह रही है।

-प्रतीक झा ‘ओप्पी’ (उत्तर प्रदेश)


Related Posts

क्यों एक ही दिन मां के लिए

May 8, 2022

क्यों एक ही दिन मां के लिए मोहताज नहीं मां तुम एक खास दिन कीतुम इतनी खास हो कि शायद

सोता हूँ माँ चैन से, जब होती हो पास

May 8, 2022

सोता हूँ माँ चैन से, जब होती हो पास  मां शब्द का विश्लेषण शायद कोई कभी नहीं कर पाऐगा, यह दो

मातृ दिवस पर कहो कैसे कह दूँ की मैं कुछ भी नहीं

May 7, 2022

“मातृ दिवस पर कहो कैसे कह दूँ की मैं कुछ भी नहीं” जिस कोख में नौ महीने रेंगते मैं शून्य

माँ तेरे इस प्यार को

May 7, 2022

माँ तेरे इस प्यार को तेरे आँचल में छुपा, कैसा ये अहसास ।सोता हूँ माँ चैन से, जब होती हो

बीते किस्से

May 7, 2022

बीते किस्से अपनी जिंदगी के कुछ नायाब किस्से मैं सुनाती हूंलोग कहते मुझे पागल , मैं तो कलम कि दीवानी

कविता-दर्द ने दस्तक दी

May 6, 2022

दर्द ने दस्तक दी आज फिर दर्द ने मेरे दिल पर दस्तक दे दी हमें यू ना रुलाओ… 2मैं इस

PreviousNext

Leave a Comment