Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Bhawna_thaker, lekh

कहाँ आज़ाद है हम

“कहाँ आज़ाद है हम” बड़े ही उत्साह, उमंग और जोश भरकर जश्न तो मना लिया पूरे देश ने आज़ादी का, …


“कहाँ आज़ाद है हम”

बड़े ही उत्साह, उमंग और जोश भरकर जश्न तो मना लिया पूरे देश ने आज़ादी का, पर क्या किसीने सोचा है कि रत्तीभर भी हम आज़ाद नहीं हुए। महज़ अंग्रेजों के साशन से ही हमें आज़ादी मिली है, और कितनी सारी संकुचित मानसिकता, कुरिवाज, परंपराएं, जातिवाद, धर्मांधता और गंदी सोच की जंजीरों में जकड़ा हुआ है समाज। क्या कभी इनसे आज़ाद हो जाएँगे हम?
हम खुद को कितने भी पढ़े-लिखें, आधुनिक और इक्कीसवीं सदी के मार्डन समझे, इस देश में कुछ लोगों की मानसिकता बदलना नामुमकिन है। जब समाज में दरिंदों के हाथों महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार होते है, तथाकथित बाबाओं और मौलवीओं के द्वारा धर्म का पतन होता है, जातिवाद पर शोषण होता है, छोटी-छोटी बातों पर विद्रोह की मशाल लेकर दंगे, फ़साद होते है, बाल विवाह आज भी होते है, कोठे पर दलालों के हाथों लड़कियाँ आज भी बिकती है। भाईचारा, अपनापन और अमन को भारत की भूमि तरस रही है, “ऐसे में कैसे मान लें कि हम आज़ाद हो चुके है”
एक तरफ़ देश आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है और एक तरफ देश में जातिवाद, अत्याचार, ज़ुल्म का दौर जारी है। देश को आजाद हुए 75 वर्ष बीत गए लेकिन अनुसूचित जाति समाज के लोगों के साथ आज भी जातिवाद और भेदभाव के चलते अत्याचार जारी है। जिसका उदाहरण हाल ही में घटी घटना है।
सुराणा जालौर जिले के निवासी देवाराम मेघवाल का बच्चा प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहा था। स्कूल में प्यास लगी तो बच्चे ने मटके से पानी पी लिया, बस बच्चे का यही अपराध था। जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त एक अध्यापक शैलू सिंह ने गुस्सा होते हुए बच्चे को बेरहमी से पीटा जिस कारण आज उस मासूम बच्चे की मृत्यु हो गई। एक अध्यापक की मानसिकता ही इतनी निम्न, गिरी हुई और कुंठा होगी वो बच्चों को क्या शिक्षा देंगे? बच्चे की हालत देख खून खौल उठा कि, कब हमारा समाज इंसान को जाता-पात से उपर उठकर इंसान समझेगा? कब तक उच्च-नीच और असमानता की विचारधारा से उपर उठेगा? इन सारी कुरीतियों से कब आज़ाद होगा।
आजादी के इस सफर में देश के इतिहास में कई ऐसे पड़ाव आए जोकि हर देशवासी के लिए गर्व और स्वाभिमान के प्रतीक बन गए। भौतिक तरक्की तो बहुत की हमने, पर मानसिक रुप से अठारहवीं सदी में ही रह गए। आजादी के बाद ‘भारत’ ने 75 सारों का सफ़र पूरा कर लिया है। आज जब हम 75वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहे है; तब शिद्दत के साथ इस सफ़र की समीक्षा करने की आवश्यता है। आज भी कुछ ऐसी कुरीतियां हमारे समाज में विद्ममान है जिनको देख मन ही मन हर वक्त यह सवाल उठता है कि आख़िर कुरीतियों से आजादी कब मिलेगी? कब सोच बदलेगी? ज़रूरत है एक ऐसी शुरुआत की जो मानसिक स्वतंत्रता भी दे ताकि महिलाएं, बच्चे, दलित, गरीब, आदिवासी खुद को सुरक्षित और आज़ाद महसूस कर सकें। जिस दिन इन सारे मुद्दों से समाज को निज़ात मिलेगा उस दिन असल में हम आज़ाद कहलाएंगे।

About author

Bhawna thaker
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु


Related Posts

मूलभूत साक्षरता में सामुदायिक जुड़ाव और माता-पिता की भागीदारी

November 28, 2022

 मूलभूत साक्षरता में सामुदायिक जुड़ाव और माता-पिता की भागीदारी हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्कूलों के लिए सीधे फंड

आओ परिस्थितियों से लड़कर इतिहास रचें

November 27, 2022

हिम्मत-ए-मर्दां मदद-ए-ख़ुदा आओ परिस्थितियों से लड़कर इतिहास रचें जो खुद में स्थिर होते हैं, हर परिस्थितियों से लड़ते हैं, वही

किताबी शिक्षा बनाम व्यवहारिक शिक्षा

November 27, 2022

किताबी शिक्षा बनाम व्यवहारिक शिक्षा डिग्रीयां तो पढ़ाई के खर्चे की रसीदें है – ज्ञान तो वही है जो किरदार

आओ अपनी काबिलियत का लोहा मनवाएं|let’s prove our ability

November 27, 2022

आओ अपनी काबिलियत का लोहा मनवाएं आओ अपने व्यक्तित्व को अपनी पहचान बनाकर इतिहास रचें व्यक्तित्व निर्माण एक सतत प्रक्रिया

लव जिहाद-आंखों पर पट्टीयां ना बांधों प्यार की बेटियों

November 26, 2022

आंखों पर पट्टीयां ना बांधों प्यार की बेटियों- लव जिहाद Love jihad जी हां , आज जब खुद से ही

तबस्सुम| Tabassum

November 25, 2022

तबस्सुम तबस्सुम| Tabassum  एक ऐसी कलाकारा जिसको भूल पाना मुश्किल होगा,हालाकि वह उतनी मशहूर नहीं थी। न ही बिग बैनर

PreviousNext

Leave a Comment