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कहाँ आज़ाद है हम

“कहाँ आज़ाद है हम” बड़े ही उत्साह, उमंग और जोश भरकर जश्न तो मना लिया पूरे देश ने आज़ादी का, …


“कहाँ आज़ाद है हम”

बड़े ही उत्साह, उमंग और जोश भरकर जश्न तो मना लिया पूरे देश ने आज़ादी का, पर क्या किसीने सोचा है कि रत्तीभर भी हम आज़ाद नहीं हुए। महज़ अंग्रेजों के साशन से ही हमें आज़ादी मिली है, और कितनी सारी संकुचित मानसिकता, कुरिवाज, परंपराएं, जातिवाद, धर्मांधता और गंदी सोच की जंजीरों में जकड़ा हुआ है समाज। क्या कभी इनसे आज़ाद हो जाएँगे हम?
हम खुद को कितने भी पढ़े-लिखें, आधुनिक और इक्कीसवीं सदी के मार्डन समझे, इस देश में कुछ लोगों की मानसिकता बदलना नामुमकिन है। जब समाज में दरिंदों के हाथों महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार होते है, तथाकथित बाबाओं और मौलवीओं के द्वारा धर्म का पतन होता है, जातिवाद पर शोषण होता है, छोटी-छोटी बातों पर विद्रोह की मशाल लेकर दंगे, फ़साद होते है, बाल विवाह आज भी होते है, कोठे पर दलालों के हाथों लड़कियाँ आज भी बिकती है। भाईचारा, अपनापन और अमन को भारत की भूमि तरस रही है, “ऐसे में कैसे मान लें कि हम आज़ाद हो चुके है”
एक तरफ़ देश आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है और एक तरफ देश में जातिवाद, अत्याचार, ज़ुल्म का दौर जारी है। देश को आजाद हुए 75 वर्ष बीत गए लेकिन अनुसूचित जाति समाज के लोगों के साथ आज भी जातिवाद और भेदभाव के चलते अत्याचार जारी है। जिसका उदाहरण हाल ही में घटी घटना है।
सुराणा जालौर जिले के निवासी देवाराम मेघवाल का बच्चा प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहा था। स्कूल में प्यास लगी तो बच्चे ने मटके से पानी पी लिया, बस बच्चे का यही अपराध था। जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त एक अध्यापक शैलू सिंह ने गुस्सा होते हुए बच्चे को बेरहमी से पीटा जिस कारण आज उस मासूम बच्चे की मृत्यु हो गई। एक अध्यापक की मानसिकता ही इतनी निम्न, गिरी हुई और कुंठा होगी वो बच्चों को क्या शिक्षा देंगे? बच्चे की हालत देख खून खौल उठा कि, कब हमारा समाज इंसान को जाता-पात से उपर उठकर इंसान समझेगा? कब तक उच्च-नीच और असमानता की विचारधारा से उपर उठेगा? इन सारी कुरीतियों से कब आज़ाद होगा।
आजादी के इस सफर में देश के इतिहास में कई ऐसे पड़ाव आए जोकि हर देशवासी के लिए गर्व और स्वाभिमान के प्रतीक बन गए। भौतिक तरक्की तो बहुत की हमने, पर मानसिक रुप से अठारहवीं सदी में ही रह गए। आजादी के बाद ‘भारत’ ने 75 सारों का सफ़र पूरा कर लिया है। आज जब हम 75वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहे है; तब शिद्दत के साथ इस सफ़र की समीक्षा करने की आवश्यता है। आज भी कुछ ऐसी कुरीतियां हमारे समाज में विद्ममान है जिनको देख मन ही मन हर वक्त यह सवाल उठता है कि आख़िर कुरीतियों से आजादी कब मिलेगी? कब सोच बदलेगी? ज़रूरत है एक ऐसी शुरुआत की जो मानसिक स्वतंत्रता भी दे ताकि महिलाएं, बच्चे, दलित, गरीब, आदिवासी खुद को सुरक्षित और आज़ाद महसूस कर सकें। जिस दिन इन सारे मुद्दों से समाज को निज़ात मिलेगा उस दिन असल में हम आज़ाद कहलाएंगे।

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Bhawna thaker
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु


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