Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Nandini_laheja, poem

कविता – ‘रूह’ | kavita rooh

कविता – ‘रूह’ मैं अजर हूँ मैं अमर, जीवन मृत्यु से हूँ परे।रहती हूँ प्राणी के तन में मैं,दिए में …


कविता – ‘रूह’

कविता – 'रूह' | kavita rooh
मैं अजर हूँ मैं अमर,

जीवन मृत्यु से हूँ परे।
रहती हूँ प्राणी के तन में मैं,
दिए में लौ की तरह
काया की मैं वो साथी हूँ,
जो देती उसको जीवन है।
जीता अनेकों जज़्बातों को प्राणी,
जब तक संग रहती हूँ मैं।
पर मैं वो पंछी हूँ,
जो सदा न रहता पिंजरे मैं।
जब खुलता पिंजरा देह का,
कहीं दूर उड़ जाती हूँ मैं
हां मैं रूह हूँ तेरी बन्दे,
जिसकी वजह से तू ज़िंदा है।
पर ना मोह में रहना मेरे,
तन को बदलती रहती हूँ मैं।

About author

नंदिनी लहेजा | Nandini laheja
नंदिनी लहेजा
रायपुर(छत्तीसगढ़)
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित

Related Posts

peedhiyon ka antar by Jitendra Kabir

July 31, 2021

 पीढ़ियों का अंतर बच्चे! वर्तमान में जीना  चाहते हैं अपने बाल मन के कारण, इसलिए मौका मिलता है जब भी

Devtavon ke guru brihaspati by Anup Kumar Varma

July 25, 2021

शीर्षक – ” देवताओं के गुरु बृहस्पति”  जो अंधेरे से उजाले की ओर ले जाए,  वही तो हम सबका गुरु

chal chod ye aadat hai koi khta nhi by shashi suman up

July 23, 2021

 शीर्षक चल छोड़, ये आदत है, कोई खता नहीं l तेरे फ़िक्र में हैं हम और तुझे पता नहीं l

abhilasha poem by abhilekha ambasth gazipur

July 23, 2021

अभिलाषा अधरों पे मुस्कान लिए,  शहरों में अब गांव मिले,  मधुर वाणी की सरगम में,  शहरों में अब गांव पले, 

zindagi ka wada by Abhilekha Ambasth Gazipur

July 23, 2021

शीर्षक-जिंदगी का वादा कहीं कम तो कहीं ज्यादा, बस यही है जिंदगी का वादा,  कहीं धूप कहीं छाया,  बस यही

shabdo ki chot kavita by samay singh jaul delhi

July 23, 2021

शब्दों की चोट शब्दों की चोट जब पड़ती है।   चित्त में चेतना की चिंगारी निकलती है।।   जैसे बसंत में भी

Leave a Comment