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करवाचौथ: वैज्ञानिक विश्लेषण

करवाचौथ: वैज्ञानिक विश्लेषण कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ कहते हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियां अपने …


करवाचौथ: वैज्ञानिक विश्लेषण

करवाचौथ: वैज्ञानिक विश्लेषण

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ कहते हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु के लिए दिन भर निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। इस व्रत की शुरुआत कब हुई इस बारे में मान्यता है कि जब ब्रह्मा जी ने देवताओं और असुरों के बीच चल रहे संग्राम में देवताओं की विजय सुनिश्चित करने के लिए देव पत्नियों को करवा चौथ का व्रत रखने को कहा था। इंद्राणी समेत समस्त देव पत्नियों ने इस व्रत को रखा था। यह तो हुई मान्यताओं की बात। परंतु यह सिर्फ परंपरा और रीति रिवाज तक ही सीमित नहीं है। इस व्रत का एक वैज्ञानिक पहलू भी है जिसको जाने बिना गृहणियां यह व्रत रखती है।

सभी जीवित वस्तुएं जलवायु के अलावा सूर्य और चंद्रमा की गति से प्रभावित होती हैं। पृथ्वी का ध्रुवीय झुकाव, सूर्य और चंद्रमा से दूरी (स्थिति) विलक्षण है। पृथ्वी की ऊपर से नीचे होने वाली गति जो की संक्रांति कहलाती है शरीर पर बहुत प्रभाव डालती है। विशेष रूप से हमारी सोने की शक्ति, हमारा पाचन तंत्र और प्रजनन स्वास्थ्य पर। मनुष्य का शरीर तीन दोषों से संचालित होता है वात, पित्त और कफ। इनमें से किसी के असंतुलन से शरीर बीमार हो जाता है। ऋतुओं के परिवर्तन से इनका स्तर ऊपर-नीचे होता रहता है।

जून से पृथ्वी अपनी नीचे की ओर यात्रा शुरू करती है। जिससे उत्तरी गोलार्ध में सूर्य का प्रकाश कम हो जाता है। इसके अलावा, मानसून से पृथ्वी ठंडी हो जाती है। पृथ्वी के ठंडा होने से पाचन तंत्र धीमा हो जाता है। कफ और वात में वृद्धि होने लगती है। इधर मानसून के चिपचिपे मौसम के विदा होने पर हम स्वादिष्ट और गरिष्ठ भोजन खाना शुरू कर देते हैं। पृथ्वी का ठंडा होना भी महिलाओं के प्रजनन चक्र को प्रभावित करता है। उपवास शरीर में बैलेंस लाता है और विशमुक्त करता है और भोजन को संतुलित रखने में हमारी इच्छा शक्ति को बढ़ाता है।

करवाचौथ पूर्णिमा के बाद चौथे दिन ही क्यों मनाया जाता है? क्या आप जानते हैं कि चंद्रमा शरीर को उसी प्रकार प्रभावित करता है जैसे कि महासागर में ज्वार भाटे के रूप मे। चंद्रमा मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। जिससे कि हमारी मनोदशा और नींद और भूख का पैटर्न प्रभावित होता है। जैसे-जैसे पूर्णिमा नजदीक आती है हमारी भूख बढ़ने लगती है। और जैसे-जैसे चंद्रमा ढलने लगता है हमारी भूख धीरे-धीरे कम होने लगती है। करवाचौथ शरद पूर्णिमा के चौथे दिन आता है। इससे व्यक्ति के लिए भूख पर अंकुश लगाना और साथ ही उपवास के माध्यम से अपने शरीर को नियंत्रित करना आसान हो जाता है।

उपवास जमा वसा को तोड़कर ऊर्जा पैदा करने में मदद करता है। यह हमारे अंगों से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है जिससे शरीर की सफाई में सहायता मिलती है। चूंकि मानसून के कारण प्रजनन स्वास्थ्य में बाधा आती है, इसलिए करवाचौथ संतान प्राप्ति के लिए हरी झंडी देता है । इसके अलावा, यह प्रोटीन संश्लेषण की उच्च दक्षता के कारण उपचार प्रक्रिया को तेज करता है जिससे कोशिकाएं, अंग और ऊतक स्वस्थ होते हैं।भुखमरी रोगाणु कोशिकाओं की रक्षा करती है। यह प्रजनन चक्र को नियमित करने में मदद करता है। जिससे प्रजनन दीर्घायु होती है। इस पर सी. एलिगेंस पर विस्तृत शोध की गई है।

यही एक कारण है कि ढलते चंद्रमा की ओर एकादशी व्रत रखने की सलाह दी जाती है। यह हमारे शरीर को निर्जलीकरण से बचाने में मदद करता है। जबकि पूर्णिमा की रात को सबसे ज्यादा भूख लगती है। यदि इसका संबंध महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य से अधिक है तो इस त्योहार को पति की लंबी उम्र से क्यों जोड़ा जाता है? इसका कारण यह है कि पूर्व का समाज रूढ़िवादी था और सेक्स अथवा महिला प्रजनन स्वास्थ्य के ऊपर बात करना वर्जित माना जाता था।
© लक्ष्मी दीक्षित

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Laxmi Dixit
लक्ष्मी दीक्षित
(लेखिका, आध्यात्मिक गाइड)

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