Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

kishan bhavnani, lekh

एक देश एक कानून समय की मांग

एक देश एक कानून समय की मांग क्या भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने का उचित समय अभी आ …


एक देश एक कानून समय की मांग

एक देश एक कानून समय की मांग
क्या भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने का उचित समय अभी आ गया है ??

दशकों से चर्चा में रहे समान नागरिक संहिता को लागू करने आम सहमति बनाने की प्रक्रिया में तेजी लाने का उचित समय आ गया है- एड किशन भावनानी

गोंदिया – भारत अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहां सर्वधर्म मनीषियों के लिए अादर, उनके धर्म, जाति प्रजाति, संस्कृति, सभ्यता, भाषा, बोली, और लिपि के लिए भारत का सबसे महत्वपूर्ण मज़बूत प्रलेख भारतीय संविधान द्वारा मौलिक अधिकार दिया गया है, जिसमें विशेष रूप से अनुच्छेद 26, 27, 28 में उल्लेखित अधिकार और व्यवस्था दी है जिसे अगर हम ध्यान से एक-एक शब्द को पढ़कर उसका अर्थ निकालेंगे तो हमें वास्तविकता समझ में आ जाएगी।
साथियों बात अगर हम सर्वधर्म हिताय भारत की करें तो हर धर्म, जाति को सम्मान, समानता दी जाती है परंतु फ़िर भी हम दशकों से देख रहे हैं कि विशेष रूप से दो समुदायों में अक्सर विवाद, बयान और असहमति, उभरकर सामने आती है जिसकी वजह में हम नहीं जाना चाहते परंतु यह सच है कि सांप्रदायिक सद्भावना भारत की खूबसूरती है जिसे बनाए रखना हर नागरिक का प्राथमिक कर्तव्य है।
साथियों बात अगर हम कर्नाटक के एक शिक्षा संस्थान में हुए एक विवाद की करें तो इसने भारत के अनेक राज्यों से होते हुए अब अन्तर्राष्ट्रीय क्षवि के रूप में उभारने की कोशिश खासकर पड़ोसी मुल्क सहित कुछ देशों द्वारा की जा रही है जिसे देखते हुए दशकों से चर्चा में रहे समान नागरिक संहिता को अब आम सहमति से लागू करने की प्रक्रिया में तेजी लाने की जरूरत है।
हालांकि इसपर चर्चा लंबे समय से चल रही है परंतु वर्तमान स्थितियों, परिस्थितियों को देखते हुए मेरा मानना है कि इस प्रक्रिया में तेजी लाने की तात्कालिक जरूरत है क्योंकि सिविल कानूनों में एक देश एक कानून अब समय की मांग है।
साथियों बात अगर हम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 की करें तो, भारत के संविधान का अनुच्छेद 44 ये निर्देश देता है कि उचित समय पर सभी धर्मों के लिए पूरे देश में ‘समान नागरिक संहिता’ लागू की जाए, लेकिन कभी किसी हितधारियों के हित की वजह से, कभी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की वजह से और कभी सरकार को बचाए रखने के लिए इस विषय को छेड़ा तक नहीं जाता। यही वजह है कि भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, लेकिन ये आज भी प्रासंगिक नहीं है, ऐसी आशंका मीडिया में व्यक्ति की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट भी दे चुका है सरकार को सलाह – वर्ष 1985 में शाह बानो केस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड देश को एक रखने में मदद करेगा। तब कोर्ट ने ये भी कहा था कि देश में अलग-अलग क़ानूनों से होने वाले विचारधाराओं के टकराव ख़त्म होंगे। वर्ष 1995 में भी सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को ये निर्देश दिये थे कि संविधान के अनुच्छेद 44 को देश में लागू किया जाए।
साथियों बात अगर हम समान नागरिक संहिता में गोवा की करें तो, वर्ष 1961 में जब गोवा का भारत में विलय हुआ था, तभी से वहां यूनिफार्म सिविल कोड लागू है। याने वहां संबंधित धर्म को मानने वाले पुरुष एक से ज्यादा शादी नहीं कर सकते, सभी धर्मों की लड़कियों के लिए शादी की उम्र एक जैसी है और तलाक और सम्पत्ति के बंटवारे में भी महिलाओं को एक जैसे अधिकार हासिल हैं। याने वहां कानूनों को अलग अलग धर्मों के हिसाब से तय नहीं किया गया है।
साथियों बात अगर हम वर्तमान परिपेक्ष में चल रहे दो समुदायों में विवाद और उछाले जा रहे दो पारस्परिक नारों की करें तो दोनों पारस्परिक समुदायों में भयंकर उन्माद का माहौल तैयार होने में देर नहीं लगेगी। हालांकि सरकारें अलर्ट लेवल पर हैं परंतु अधिकतर नागरिकों के मन में गूंज रहा है कि, देश में कब लागू होगा यूनिफॉर्म सिविल कोड?

स्कूलों में फैल रहा साम्प्रदायिकता का ये संक्रमण कोरोना वायरस के ओमिक्रान वेरिएंट से भी ख़तरनाक है। कोरोना की वैक्सीन तो आ गई हैं लेकिन इसकी वैक्सीन कब आएगी?. इस वायरस की वैक्सीन का नाम है, समान नागरिक संहिता देश में अगर, समान नागरिक संहिता लागू हो गया तो हमारे देश के अंदाजी 15 लाख स्कूलों में पढ़ने वाले 25 करोड़ छात्र इस वायरस से बच जाएंगे। समान नागरिक संहिता एक सेक्युलर याने धर्मनिरपेक्ष कानून है, जो किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है।
लेकिन भारत में अभी इस तरह के क़ानून की व्यवस्था नहीं है। फिलहाल देश में हर धर्म के लोग शादी, तलाक़ और ज़मीन ज़ायदाद के मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के मुताबिक़ करते हैं।मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय के अपने पर्सनल लॉ हैं, जबकि हिंदू पर्सनल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म के सिविल मामलों का निपटारा होता है। कहने का मतलब ये है कि अभी एक देश, एक क़ानून की व्यवस्था भारत में नहीं है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरणका अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि एक देश एक कानून समय की मांग है,क्या भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने का उचित समय अभी आ गया है ?? दशकों से चर्चा में रहे समान नागरिक संहिता को लागू करने, आम सहमति बनाने की प्रक्रिया में तेज़ी लाने का उचित समय आ गया है जिस पर विचार करने की तात्कालिक ज़रूरत है।

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र


Related Posts

OTT OVER THE TOP Entertainment ka naya platform

July 23, 2021

 ओटीटी (ओवर-द-टॉप):- एंटरटेनमेंट का नया प्लेटफॉर्म ओवर-द-टॉप (ओटीटी) मीडिया सेवा ऑनलाइन सामग्री प्रदाता है जो स्ट्रीमिंग मीडिया को एक स्टैंडअलोन

Lekh jeena jaruri ya jinda rahna by sudhir Srivastava

July 23, 2021

 लेखजीना जरूरी या जिंदा रहना        शीर्षक देखकर चौंक गये न आप भी, थोड़ा स्वाभाविक भी है और

Ram mandir Ayodhya | Ram mandir news

July 21, 2021

 Ram mandir Ayodhya | Ram mandir news  इस आर्टिकल मे हम जानेंगे विश्व प्रसिद्ध राम मंदिर से जुड़ी खबरों के

umra aur zindagi ka fark by bhavnani gondiya

July 18, 2021

उम्र और जिंदगी का फर्क – जो अपनों के साथ बीती वो जिंदगी, जो अपनों के बिना बीती वो उम्र

mata pita aur bujurgo ki seva by bhavnani gondiya

July 18, 2021

माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा के तुल्य ब्रह्मांड में कोई सेवा नहीं – एड किशन भावनानी गोंदिया  वैश्विक रूप से

Hindi kavita me aam aadmi

July 18, 2021

हिंदी कविता में आम आदमी हिंदी कविता ने बहुधर्मिता की विसात पर हमेशा ही अपनी ज़मीन इख्तियार की है। इस

Leave a Comment