Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem, vijay_lakshmi_pandey

ऊँचा हो गया कद लोगों का जमींन से-विजय लक्ष्मी पाण्डेय

ऊँचा हो गया कद लोगों का जमींन से ऊँचा हो गया कद लोगों का जमीन सेसुना है जमीनें बंजर पड़ी …


ऊँचा हो गया कद लोगों का जमींन से

ऊँचा हो गया कद लोगों का जमींन से-विजय लक्ष्मी पाण्डेय
ऊँचा हो गया कद लोगों का
जमीन से
सुना है जमीनें बंजर पड़ी हैं।
गोबर से दुर्गंध आनें लगी है ,
माटी की खुशबू कहाँ से आएगी
जब मुँह पर पट्टी लगी है ।
सामनें वाली उपजाऊ भूमि
परती पड़ी है।
क्यों न हो जब सब काम ऊंचाई
पर हो जाये
मुफ़्त का राशन
दो जून की रोटी दे ही
जाती है
पिछले बरस बैलों की छुट्टी कर दी।
चारा घोटाले में चला गया
बैलों की घण्टी कबाड़ी को दे दी
घर की डिजाइन जो बदलवानी थी
काका का हल नज़र नहीं आता कहीं
शायद थुनीं बना दी
काकी नें बताया हरी तरकारी भी
पैकेट में आनें लगे हैं
टमाटर न सही
विटामिन की गोली से काम चलानें
लगे है
डल्लप गाड़ी गिरवी पड़ी हैं
पेट्रोल डीजल महंगी बड़ी है
बिटिया की हल्दी गहनों पर अड़ी है।
क्या करें सोना तो दूर चाँदी भी
सिर पर चढ़ी है।
पाठ शालाएं चिढ़ानें लगे है,
नौनिहालों का बस्ता धूल में पड़े है।
यज्ञशालायें बन्द पड़ी हैं
देवालय पर भारी घड़ी है।
रसवंती रस से भरी है,
क्यों न हो ..?
आखिर इसी नें सब सम्भाल रखी है..!!
घुटनें चलते नहीं
पैसे टिकते नहीं
सब योगा पर लगे हैं
एलोवेरा जेल बनकर शीशी में
पड़ी है
नीम की निमोली पहचान बनानें पर तुली है।
मंझले काका की दवाई
बाजारों में सजी है
इस “विजय” की मुस्कान
चुभती बड़ी है ।
बाबा की जड़ी -बूटी संजीवनी बनी है ।
“नीम हक़ीम ख़तरे जान” क्या-क्या कहें
मुश्किल बड़ी है।।

विजय लक्ष्मी पाण्डेय
एम.ए. ,बी.एड.(हिन्दी)
स्वरचित मौलिक रचना
आजमगढ़,उत्तरप्रदेश


Related Posts

Man ki bat by Anita Sharma

October 7, 2021

 “मन की बात” मन की बातें मन में ही रखती है नारी। बाहर निकल शब्द भूचाल बचाये। कब सोचा था

Hal-a-dil by Mahesh Ojha

October 7, 2021

 हाल-ए-दिल हाल अपना सुनाएं हम कैसे उन्हें, वो तो ग़ैरों की महफ़िल में रमे जा रहे। एक नज़र भी ना

Bhedbhav by Anita Sharma

October 7, 2021

 भेद भाव भेद भाव के रंग रूप में बंटा हुआ संसार है। * एक ईश की संतान सभी हैं। मत

Mai shapit hu by komal Mishra koyal

October 7, 2021

 मैं शापित हूँ घुट घुट कर मर जाने को मैं शापित हूँ हर बार जलाए जाने को नहीं कह पाती

Udan by Anita Sharma

October 7, 2021

 “उड़ान” मेरे घर घोंसला बनाकर, पंछी का जोड़ा आया रहने। रोज उसे तिनका-तिनका, लाते देखा करती अक्सर। आज अचानक आवाज़

Nari kitni aatmnirbhar hai by Jitendra Kabir

October 7, 2021

 नारी कितनी आत्मनिर्भर हैं? खुद के कमाए पैसे खर्च करने के लिए भी बहुत बार अपने पति  व घरवालों की

Leave a Comment