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ऊँचा हो गया कद लोगों का जमींन से-विजय लक्ष्मी पाण्डेय

ऊँचा हो गया कद लोगों का जमींन से ऊँचा हो गया कद लोगों का जमीन सेसुना है जमीनें बंजर पड़ी …


ऊँचा हो गया कद लोगों का जमींन से

ऊँचा हो गया कद लोगों का जमींन से-विजय लक्ष्मी पाण्डेय
ऊँचा हो गया कद लोगों का
जमीन से
सुना है जमीनें बंजर पड़ी हैं।
गोबर से दुर्गंध आनें लगी है ,
माटी की खुशबू कहाँ से आएगी
जब मुँह पर पट्टी लगी है ।
सामनें वाली उपजाऊ भूमि
परती पड़ी है।
क्यों न हो जब सब काम ऊंचाई
पर हो जाये
मुफ़्त का राशन
दो जून की रोटी दे ही
जाती है
पिछले बरस बैलों की छुट्टी कर दी।
चारा घोटाले में चला गया
बैलों की घण्टी कबाड़ी को दे दी
घर की डिजाइन जो बदलवानी थी
काका का हल नज़र नहीं आता कहीं
शायद थुनीं बना दी
काकी नें बताया हरी तरकारी भी
पैकेट में आनें लगे हैं
टमाटर न सही
विटामिन की गोली से काम चलानें
लगे है
डल्लप गाड़ी गिरवी पड़ी हैं
पेट्रोल डीजल महंगी बड़ी है
बिटिया की हल्दी गहनों पर अड़ी है।
क्या करें सोना तो दूर चाँदी भी
सिर पर चढ़ी है।
पाठ शालाएं चिढ़ानें लगे है,
नौनिहालों का बस्ता धूल में पड़े है।
यज्ञशालायें बन्द पड़ी हैं
देवालय पर भारी घड़ी है।
रसवंती रस से भरी है,
क्यों न हो ..?
आखिर इसी नें सब सम्भाल रखी है..!!
घुटनें चलते नहीं
पैसे टिकते नहीं
सब योगा पर लगे हैं
एलोवेरा जेल बनकर शीशी में
पड़ी है
नीम की निमोली पहचान बनानें पर तुली है।
मंझले काका की दवाई
बाजारों में सजी है
इस “विजय” की मुस्कान
चुभती बड़ी है ।
बाबा की जड़ी -बूटी संजीवनी बनी है ।
“नीम हक़ीम ख़तरे जान” क्या-क्या कहें
मुश्किल बड़ी है।।

विजय लक्ष्मी पाण्डेय
एम.ए. ,बी.एड.(हिन्दी)
स्वरचित मौलिक रचना
आजमगढ़,उत्तरप्रदेश


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