इसलिए तुमसे मिलता हूँ मैं बार बार | isliye tumse milta hu mai bar bar
इसलिए तुमसे मिलता हूँ मैं बार बार इसलिए तुमसे मिलता हूँ , मैं बार बार। मैं मनाता हूँ तुमको, इसलिए …
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दिल ढूँढता है कहाँ गए बचपन के वो दिन,जो निश्चिंतता में गुजरते थे।ना लोभ था,ना कोई कपट,निश्छलता लिए रहते थे।दिल
कवि का ह्रदय है – नंदिनी लहेजा
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पाखंड लगता है- जितेन्द्र ‘ कबीर ‘
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कोई रंग ऐसा बरस जाए- जितेन्द्र ‘कबीर’
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