Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Jitendra_Kabir, poem

इंसानियत को बचाओ- जितेन्द्र ‘कबीर’

इंसानियत को बचाओ दुनिया मेंकहीं भी हो रहा हो अन्यायतो उसके खिलाफ आवाज उठाओ,रोकने की उसे करो पुरजोर कोशिशेंविरुद्ध उसके …


इंसानियत को बचाओ


दुनिया में
कहीं भी हो रहा हो अन्याय
तो उसके खिलाफ आवाज उठाओ,
रोकने की उसे करो पुरजोर कोशिशें
विरुद्ध उसके जनमत बनाओ,
कि कल को हो सकते हैं
हमारे भी ऐसे ही हालात,
इसलिए पीड़ितों के आज को बचाओ,
अपने आने वाले कल को बचाओ।

दुश्वारियां हैं
इस राह पर बड़ी सोचकर यह
संघर्ष से कभी न घबराओ,
जुल्म देखकर होता कोई
अपना मुंह न यूं दूसरी तरफ फेर जाओ,
कि हमारा डर ही बड़ी वजह है
हमारे ऊपर अत्याचार होते रहने की,
इसलिए रखकर हौसला उससे
एक बार उससे अपनी नज़र मिलाओ,
अपने मन से उसे दूर भगाओ।

नस्लों और धर्मों के आधार पर
इंसान को बांटने वाले बहुरूपियों के
बहकावे में मत भूलकर कभी आओ,
इंसानियत रहेगी तो रहेगा धर्म भी
यह बात जितनी जल्दी हो सके समझ जाओ,
कि सबसे जरूरी है दुनिया में
आपसी प्रेम, दया और भाईचारे को बचाना,
उसके लिए सबसे पहले इंसान को बचाओ,
इंसानियत को बचाओ।

जितेन्द्र ‘कबीर’
साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’
संप्रति – अध्यापक
पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश
संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

गुंजा के दाने

October 1, 2022

गुंजा के दाने रमणीय , मनमोहक , चमकदारगुंजा के दाने मन को हर जाते हैसुर्ख चटकीले लाल रंग लिये येकाले

गांधीजी के सिद्धांत व विचार

October 1, 2022

2 अक्टूबर 2022 महात्मा गांधी जयंती के उपलक्ष में उनके सिद्धांतों और विचारों पर मौलिक रचना कविता –गांधीजी के सिद्धांत

Phir Wahi Qissa Sunana To Chahiye

October 1, 2022

 Phir Wahi Qissa Sunana To Chahiye फिर वही क़िस्सा सुनाना तो चाहिए फिर वही सपना सजाना तो चाहिए यूँ मशक़्क़त

मुझे कहां पता था

October 1, 2022

मुझे कहां पता था आरज़ू थी तेरे संग जिंदगी बिताऊंगीआरज़ू थी तेरा साथ अंत तक मैं निभाऊंगी।। मेरी आरज़ूओं को

Gawaai Zindagi Jakar Bachhaani Chahiye Thi

October 1, 2022

Gawaai Zindagi Jakar Bachhaani Chahiye Thi गँवाई ज़िंदगी जाकर बचानी चाहिए थीबुढ़ापे के लिए मुझको जवानी चाहिए थी समंदर भी

हदें

September 28, 2022

हदें शान हैं उसी में इंसान अपनी हद में रहेंजब छोड़ हद न समंदर न ही नदी बहेँइंसान ही हद

PreviousNext

Leave a Comment