Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Bhawna_thaker, lekh

आम इंसान की परेशानियां| Problems of common man

 “आम इंसान की परेशानियां” आज आम इंसान के हालातों पर रोटी कपड़ा और मकान फ़िल्म के गानें की चंद पंक्तियाँ …


 “आम इंसान की परेशानियां”

आम इंसान की परेशानियां| Problems of common man

आज आम इंसान के हालातों पर रोटी कपड़ा और मकान फ़िल्म के गानें की चंद पंक्तियाँ याद आ रही है,

“ग़रीब को तो बच्चे की पढ़ाई मार गई

बेटी की शादी और सगाई मार गई

किसी को तो रोटी की कमाई मार गई

कपडे की किसी को सिलाई मार गई

किसी को मकान की बनवाई मार गई

बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई”

आज देश बहुत सारे हालातों से जूझ रहा है उसमें सबसे अहम मुद्दा आज महंगाई और बेरोजगारी है। उपर से पिछले दो सालों से कोरोना ने कहर बरपाया, जिसमें लाॅक डाउन के दौरान कई लोगों की नौकरियां छूट गई, कई कंपनियां बंद हो गई। मोल मौलात वाले झेल गए पर छोटे व्यापारियों की हालत खस्ता हो गई। वैश्विक मंदी ने सबकी आर्थिक व्यवस्था डावाँडोल कर दी है। पर आम इंसान को अपनी परेशानियों ने ऐसे मारा कि न कह सकते है, न सह सकते है। थोड़ा सरकार ध्यान दें और थोड़ जनता योगदान दें तभी देश वापस उपर उठ पाएगा।

बहुत सारी चुनौतियों के बीच 2024 के चुनावों तक मौजूदा सरकार को कुछ मुद्दों के प्रति जागरूक होना बेहद जरूरी है, वो है आम आदमी की परेशानियां।

महंगाई और बेरोजगारी की आग किसी भी साम्राज्य को जला कर रख देती है प्रत्यक्ष उदाहरण म्यामांर और श्रीलंका है।

सरकार की नीतियों से आम इंसान को कोई सरोकार नहीं होता। आज के ज़माने में हर कोई ज़िंदगी की चुनौतियों से लड़ते हुए दो सिरों को जोड़ने की जद्दोजहद में लगा है। महंगाई की मार से परेशान आदमी जूझ रहा है। इनको बड़े मोल, बड़ी-बड़ी गाडियाँ, ऑवर ब्रिज़, मेट्रो ट्रेन, विदेशों के साथ आयात-निकास, भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंध, चकाचक रोड या रस्ते, सरहद पर दुश्मनों से लड़ते हुए सिपाहियों की तकलिफ़े या आतंकवाद इनमें से एक भी मुद्दे के साथ कोई लेना-देना नहीं। बेशक ये सारे काम देश की प्रगति के लिए बेहद जरूरी है। पर सरकार को वोट देकर चुनने के पीछे आम इंसान का एक ही मकसद होता है सब्ज़ी, दाल, आटा, गैस के सिलेंडर और पेट्रोल-डिज़ल के साथ रोज़गार और नौकरी सहज रुप से सस्ते दामों में हासिल हो। क्यूँकि इनको जीने के लिए मेट्रो ट्रेन या मोल की जरूरत नहीं रोज़मर्रा के जीवन में उपयोग में आने वाली इन सारी चीज़ों की जरूरत है। बेशक मौजूदा सरकार ने बड़े-बड़े मुद्दों को सुलझाया है। सालों से अटके कई बिलों को पास करवा कर जनता के हित में फैसले लिए है, मुस्लिम महिलाओं को उनका हक दिलवाया तीन तलाक हटाकर राहत दिलवाई। पर शायद आम जनता की तकलिफ़ों को कम करने में कहीं न कहीं चूक गई है। लोगों का असंतोष चरम पर है। 

शिक्षा और मैडिकल इतने महंगे की आम इंसान की पहुँच से बाहर होते जा रहे है ये खर्चे। सोचिए बीस पच्चीस हज़ार या तीस हज़ार की नौकरी, घर में चार से पाँच लोगों का निर्वाह, उपर से बच्चों की पढ़ाई, बड़े बुज़ुर्गों की दवाई और अस्पताल के खर्चे। ऐसे में दिन ब दिन बढ़ती महंगाई कहाँ पहुँचे और कहाँ कटौती करें इंसान।

देखा जाए तो इतनी बड़ी आबादी वाले देश में हर मुद्दों पर नियंत्रण सरकार के हाथ में भी नहीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार पर कुछ चीज़ों के भाव तय होते है। फिर भी एयर कंडीशनर रूम में मखमली नरम गद्दे और मखमली चद्दर पर पैर फैलाकर सोने वालों को क्या पता आम इंसान की परेशानियां। कभी नज़दीक जाकर गौर करें तब पता चलेगा की आसान नहीं आम इंसान के कदमों के निशान ढूँढना। कितना भगा रही होती है ज़िंदगी। पागल कुत्तों सी चुनौतियां पीछा करती है शायद ही इनके कदम धरती पर पड़ते हो। भले पूरे न हो पर हर इंसान सपने जरूर देखता है। इनके सपनो का कहीं छोर नहीं। हर सुबह पूरी नींद लेकर भी पसीजते उठता है। बंधी हुई आय में संभव भी तो नहीं सहज तरीका कहाँ से लाए ज़िंदगी जीने का। 

दिमागी समुन्दर में ख़्वाहिशों के मगरमच्छों को दबाएं रखता है, रोटी को चटनी की तरी में भिगो कर खाने की आदत ड़ाल लेता है। पकवान की खुशबू लाख ललचाए पंचतारक होटेल की तंदूरी रोटी और पनीर दो प्याज़ा दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता इनको। अब तो दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी महंगा होता जा रहा है हज़ार के पार गैस सिलेंडर हो गया है। इनके लिए ये दुनिया कचरे के ढ़ेर सी कोहराम मचाती, गंध मारती बदबूदार है। इनको छांटने है अपने हिस्से के गौहर जो इनके काम के हो। इधर-उधर भटक कर शाम होते दो वक्त की रोटी के ज़ेवर रख दे घरवाली की हथेलियों पर तभी तो सार्थक होता है दिन भर का दौड़ना।

वोट बैंक की नीतियों को परे रखकर सरकार को एक नज़र सामान्य लोगों की परेशानियों पर करने की जरूरत है।

पेट की भूख और जरूरत के आगे धार्मिक भावना भी दम तोड़ देती है। पार्टी कोई भी हो हिन्दुत्व और धर्म के नाम पर विजयी होने का सपना अब छोड़ दीजिए और इशारों में समझ लीजिए ये पब्लिक है, जो बोरियाँ भर भरकर वोट देकर जिस नेता को सिंहासन पर सत्तारूढ़ कर सकती है वो कुर्सी खिंचकर गिरा भी सकती है।

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर


Related Posts

सौ क्विंटल के तीन फल , अरे कैसे ?

May 10, 2023

सौ क्विंटल के तीन फल , अरे कैसे ? अरे ! सच आज मैं बहुत बड़ी सोच मे उलझ गयी

The kerala story movie|द केरल स्टोरी – टैक्स फ़्री बनाम बैन

May 10, 2023

द केरल स्टोरी – टैक्स फ़्री बनाम बैन फिल्म में डिस्क्लेमर जोड़ा है कि फिल्म घटनाओं का काल्पनिक संस्करण है,

भारत में इतने मिग-21 क्रैश क्यों?

May 10, 2023

भारत में इतने मिग-21 क्रैश क्यों? मिग-21 रुस का तैयार एक फाइटर विमान है। इसका इंजन काफी पुराना है और

Blogger website पर पोस्ट कैसे लिखे? । Blog Kaise Likhe in detail

May 10, 2023

Blogger website पर पोस्ट कैसे लिखे? |Blog Kaise Likhe? पोस्ट लिखने  के लिए सबसे पहले गूगल पर blogger.com सर्च करें

राजनीति में धर्म आधारित लामबंदी साम्प्रदायिकता को दे रही चिंगारी

May 7, 2023

राजनीति में धर्म आधारित लामबंदी साम्प्रदायिकता को दे रही चिंगारी कब गीता ने ये कहा, बोली कहाँ कुरान। करो धर्म

भारत के नेतृत्व में जी-20, एससीओ सम्मिट 2023 का कुछलता से विस्तार

May 7, 2023

भारत के नेतृत्व में जी-20, एससीओ सम्मिट 2023 का कुछलता से विस्तार भारत की अध्यक्षता व मेज़बानी में शंघाई सहयोग

PreviousNext

Leave a Comment