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आज की द्रौपदी- जयश्री बिरमी

आज की द्रौपदी एक तो द्रौपदी थी तबअनेक है आज भीक्यों बचा न पाए आज के कृष्णजब बिलखती हैं वहआज …


आज की द्रौपदी

आज की द्रौपदी- जयश्री बिरमी
एक तो द्रौपदी थी तब
अनेक है आज भी
क्यों बचा न पाए आज के कृष्ण
जब बिलखती हैं वहआज भी

क्या कौरव ही रह गए है
चीरहरण के लिए आज
नहीं दिखती उन्हें घर की लाज
तड़पती ,सहमी सी नाजुक

दिल से भावुक और मन से मजबूर
अपने सपनो के जहां को करने आबाद
कली से फूल बनी ओ बन्नो
आगाह करदु तुम्हे आज ए द्रौपदी

नहीं आयेंगे कृष्ण पुरने तुम्हे चिर आज
खुद उठो रख्शो अपनी लाज
लूटी हो बहुत पर अब नहीं
बनो तुम जां बाज

घर हो चाहे हो दफ्तर या हो खुल्ला मैदान
न झुकना तुम न रुकना तुम
अब बन के दुर्गा बढ़ो तुम
अब चाहे न आए कृष्ण
तुम ही बनो रक्षक अपनी

अब तो कृष्ण न आयेंगे

जयश्री बिर्मी
अहमदाबाद


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