Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Jayshree_birmi, lekh

अपने लिए जिएं तो क्या जिएं

जीवन की राहें कभी कठिन कभी सरल हुआ करती हैं।सरल राहों पर तो हंसते हुए गुजर जातें हैं हम लेकिन …


जीवन की राहें कभी कठिन कभी सरल हुआ करती हैं।सरल राहों पर तो हंसते हुए गुजर जातें हैं हम लेकिन जब हो राह मुश्किल तो थोड़ा कष्ट होता हैं।ऐसी।मुश्किल राहों पर जो चलते हैं उन्हे संबल चाहिएं,एक सहारा चाहिएं।

मुश्किलें सामाजिक हो तब तो हाथ पकड़ने वाले हमदर्द की जरूरत बहुत ही महसूस होती हैं।ये ऐसी परिस्थिति हैं जिसे अकेले सुलझाना बहुत मुश्किल हैं।रिश्तों को निबाह ने के लिए कुछ बातों का साफ होना जरूरी होता हैं वह भी रिश्ता अगर जावाई और बेटी के ससुराल का हो।यहां उनकी जिंदगी दांव पर लग सकती हैं अगर जरा सी भी चूक या गलतफहमी हो।बड़े बुजुर्गों की मदद से ऐसी मुश्किल को हल किया जा सकता हैं।

 अगर आर्थिक मुश्किल हो तो योग्य आर्थिक सलाहकार या अपने जान पहचान वालों में से कोई योग्य व्यक्ति जिसे इन विषयों का ज्ञान हो उस से ही सलाह लें अपने मन से सोच कर निर्णय लिया जा सकता हैं।

लेकिन आज कल के जमाने में मदद करना फैशन में नहीं हैं।हर बड़ा सोचता हैं उसका प्रश्न हैं ’सानू की? ’ हमे क्या? ऐसे रवैए से जिंदगी जीना आम हो गया हैं,शायद ये पाश्चात्य से आया हुआ रिवाज हैं।एक चुटकुला हैं –एक अंग्रेज नदी के किनारे पर बैठ कुदरत के सानिध्य का मजा ले रहा था।उतनी देर में को नदी में नहाने पानी में पड़ा था वह बहने लगा।जब उसने देखा बहाते आदमी को तो चिल्लाया,” मैं इस आदमी को बचाना चाहता हूं किंतु मैं उसे जानता नहीं हूं,कोई पहचान तो करवाओ!” उतनी देर में वह आदमी पानी के प्रवाह के साथ बह गया और जिंदगी से हाथ धो बैठा।अगर पहचान की औपचारिकता में समय व्यय नहीं कर उसे बचा लेता तो उसकी जान बच जानी थी।

एक जमाने में पूरा मोहल्ला एक परिवार की तरह रहता था,सब के सुख दुःख में सभी शामिल होते थे किंतु आज उसे दूसरे के घर में तंग अड़ाना कहा जाता हैं।आज सब का दायरा अप ए धर की दीवारें बन कर रह गईं हैं।पड़ोस में कौन रहता हैं,क्या करता हैं इन सब बातों की किसी को भी परवाह नहीं हैं।एक तो विभक्त परिवार होने की वजह से घर में रहने वाले आई मीन और तीन होते हैं उपर से संकुचित मानस की वजह से अपने दायरों में सिमटे लोगों को मानसिक समस्याएं बढ़ती जा रहीं हैं।

 ’साथी हाथ बढ़ाना’ वाली भावनाएं खत्म होती जा रहीं हैं।कब और कैसे किसी की मदद की जाती हैं ऐसे खयाल से आज का युवा परे होता जा रहा हैं उपर से ये मोबाइल का व्यसन तो परिवार से भी व्यक्ति को परे करता जा रहा हैं।

 ऐसे में संस्कारों का सिंचन बचपन से ही कर उन्हे सामाजिक फर्ज को निभाना सीखना चाहिएं,कहकर नहीं कर के ,क्योंकि बच्चे वो करतें हैं जो देखते हैं,कहे का कोई अर्थ नहीं होता हैं।”Children do what they see”.

About author

Jayshree birimi
जयश्री बिरमी
अहमदाबाद (गुजरात)

Related Posts

सुपरहिट कन्हैयालाल: कर भला तो हो भला | Superhit Kanhaiyalal

January 19, 2023

सुपरहिट कन्हैयालाल: कर अच्छा तो हो अच्छा ओटीटी प्लेटफॉर्म एम एक्स प्लेयर पर ‘नाम था कन्हैयालाल’ नाम की एक डाक्यूमेंट्री

आपदा जोखिम की जड़ें कहीं? अंकुर कहीं।Where are the roots of disaster risk? Sprout somewhere.

January 19, 2023

आपदा जोखिम की जड़ें कहीं? अंकुर कहीं। अनियंत्रित शहरीकरण, भूकंपीय क्षेत्रों में निर्माण, तेजी से कटाव की गतिविधि ने इस

केंद्र और राज्य सरकार के बीच पिसता आम आदमी

January 19, 2023

 केंद्र और राज्य सरकार के बीच पिसता आम आदमी एक दशक से देश की सियासत में एक तरह की राजनीति

राजनीतिक लाभ के लिए सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग

January 19, 2023

राजनीतिक लाभ के लिए सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग स्वतंत्र, कानून का पालन करने वाले संस्थान आवश्यक जांच और संतुलन सुनिश्चित

व्यक्त होना सीखें : प्यार हो या बात | Learn to Express: Love or Talk

January 19, 2023

व्यक्त होना सीखें : प्यार हो या बात, व्यक्त नहीं होंगी तो मूर्ख मानी जाएंगी हम सुनते आए हैं कि

beti par lekh| बेटी पर लेख

January 19, 2023

मुझे मेरी बेटी पर गर्व है बेटियां मां लक्ष्मी सरस्वती का स्वरूप है आओ समाज में फैली कुरीतियों से बेटियों

PreviousNext

Leave a Comment