Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Dr-indu-kumari, poem

अकेली होती कहां

 अकेली होती कहां डॉ. इन्दु कुमारी मेरे तो सब साथी  मैं अकेली होती कहां  हवा से भी बातें करती  पेड़ …


 अकेली होती कहां

डॉ. इन्दु कुमारी
डॉ. इन्दु कुमारी

मेरे तो सब साथी

 मैं अकेली होती कहां

 हवा से भी बातें करती

 पेड़ पौधे है साथी

 प्रेम के दीप जले हृदय में 

जैसे जलत रहे बाती

 ना द्वेष मन में पलता

ना राग किसी से भी है 

निस्वार्थ हवा सी 

अविरल बहा करती हूं।

वैर पालते हैं जो कोई 

चैन उन्हें मिलता नहीं 

निकम्मों को पैर खींचने 

का मौका तो चाहिए

 हम नदी की धारा है

 मंजिल की ओर बहा करते

 कम से कम मलाल नहीं 

किसी के पैर को 

खींचा तो नहीं करते 

लोगों के दुखों से

 द्रवित होता मन

यह एहसास तो 

अभी नहीं मरे हैं 

जमीर जिंदा है दिल में 

दीन दुखियों की 

पीड़ा सुनाई देती 

दुखती रग तो

 नहीं दबाया हमने 

प्यार के सांकल

 पर जंजीर तो 

नहीं लगाया हमने।

जियो और जीने दो 

की भावना तो है मन में।

    डॉ. इन्दु कुमारी 

मधेपुरा बिहार


Related Posts

जरा सोचो इंसान – मईनुदीन कोहरी”नाचीज बीकानेरी”

January 25, 2022

जरा सोचो इंसान अपनी जुबां से किसी को कभी ना सताना।मौत भी आकर कहे तो बहाना ये बनाना।।सम्भल कर कदम

माँ का आँचल- सिद्धार्थ गोरखपुरी

January 25, 2022

कविता -माँ का आँचल माँ एक बार फिर से मुझको,आँचल ओढ़ के सो जाने देबचपन की यादें ताज़ा हो जाएँ

अक्ल पर पत्थर मढ़े जाएं- जितेन्द्र ‘कबीर’

January 25, 2022

अक्ल पर पत्थर मढ़े जाएं दुनिया में लोगों ने पहलेअपनी – अपनी आस्था के अनुसारमंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारेऔर भी नाना

शीत लहर – डॉ. इन्दु कुमारी

January 25, 2022

शीत लहर है बड़ी शबाब परहाड़ कंपाने वालीअमीरों की कुछ नहै बिगाड़ने वालीगरीबों की झोपड़ीमें सनसनी फैलानेधाक जमाने वालीआहत करने

चाँद और मैं- सिद्धार्थ गोरखपुरी

January 25, 2022

चाँद और मैं अमावस की काली रातों मेंउलझी हुई कई बातों मेंन पूछ! किस तरहा रहते हैंचाँद और मैं एक

अंजान राहें!- अनिता शर्मा

January 25, 2022

अंजान राहें!! है अंजान राहें थमती नहींनित नये रास्ते मिलते ही जायें।जीवन डगर पर मुस्कान बिखेरीबढ़ते चले हैं बाधाओं से

Leave a Comment