Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Dr-indu-kumari, poem

हिन्दी बेचारी- डॉ. इन्दु कुमारी

हिन्दी बेचारी राष्ट्र है मेरे अपने घरभारती हूँ मैं कहलाती जनमानस की हूँ सदासरल अभिव्यक्ति मैं राजदुलारी जन सभा कीअवहेलना …


हिन्दी बेचारी

हिन्दी  बेचारी- डॉ. इन्दु कुमारी
राष्ट्र है मेरे अपने घर
भारती हूँ मैं कहलाती

जनमानस की हूँ सदा
सरल अभिव्यक्ति मैं

राजदुलारी जन सभा की
अवहेलना का दंश मुझे तो

आज तक बरबस झेलना
नियति हमारी सदियों से

बनती आ रही है, घर में
अकेली महिला की भाँति

प्रताड़ित होती आ रही है
पिता हमारे खेवनहार वो

नजर अंदाज़ है करते रहे
घर की बनकर रह गई चेरी

उपेक्षिता सी जिंदगी मेरी
जब कभी आवाज उठाई

विदेशी सौतन आगे आई
पद प्रतिष्ठा मिली उनको

शिकार होना पड़ा मुझको
क्या कहूँ घरवाले तुझको

विदेशी ने जब पैर पसारी
देखो कैसे बनायेबेचारी

देखो कैसे बन गई बेचारी
जन जागरण हम मिलकर

जागृति फैलाए ,लहराकर
जन सैलाब ,निकाले हम

कदम से कदम बढाए हम 
चिनगारी अब धधक उठी

रोके ना रुकेगी ये जमाने
देखो ऐ देखो दुनिया वाले।

डॉ. इन्दु कुमारी
मधेपुरा बिहार


Related Posts

अकेली होती कहां

June 24, 2022

 अकेली होती कहां डॉ. इन्दु कुमारी मेरे तो सब साथी  मैं अकेली होती कहां  हवा से भी बातें करती  पेड़

जल संरक्षण

June 24, 2022

 जल संरक्षण डॉ. इन्दु कुमारी जल ही जीवन है जीवन के संजीवन है इसे बचाना पुण्य कार्य  यही असली जनसेवार्थ।

लहरों से दोस्ती महंगी पड़ी हुज़ूर ज्वार उठा ऐसा की तैरना जानते हुए भी शख्सियत मेरी किनारे लगी

June 23, 2022

 “लहरों से दोस्ती महंगी पड़ी हुज़ूर ज्वार उठा ऐसा की तैरना जानते हुए भी शख्सियत मेरी किनारे लगी” भावना ठाकर

कितना कठिन होता है ना? माँ होना

June 23, 2022

 कितना कठिन होता है ना? माँ होना सिद्धार्थ गोरखपुरी बचपने से सबको खुश कर देना और जवां होना। बस उँगलियों

कविता – छाँव सा है पिता

June 23, 2022

 कविता – छाँव सा है पिता सिद्धार्थ गोरखपुरी गलतफहमी है के अलाव सा है पिता घना वृक्ष है पीपल की

कविता -आँखें भी बोलती हैं

June 23, 2022

 कविता -आँखें भी बोलती हैं सिद्धार्थ गोरखपुरी न जीभ है न कंठ है कहने का न कोई अंत है दिखने

PreviousNext

Leave a Comment