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Jayshree_birmi, poem

हां ये तपिश हैं

हां ये तपिश हैं ठंडे न होंगे ये सिने जिसमे हैं दहकलाखों में न सही हजारों में हीललकार हैं प्रतिकार …


हां ये तपिश हैं

हां ये तपिश हैं
ठंडे न होंगे ये सिने जिसमे हैं दहक
लाखों में न सही हजारों में ही
ललकार हैं प्रतिकार हैं और है चाह–ए– वतन
न तब जुके थे न ही अब जुकेंगे
दुनियां को दिखा दिए हैं दिमागी जलवे
अब करामात देखना हम ही सब से आगे होंगे
थे अव्वल ये सब जन गए हैं
अव्वल होंगे अब भी ये पहचान लेंगे
जिंदा दिलों की तपिश ही करेगी उजाले
हमारी तरक्कियो की
बस कमी हैं तो उन अंचलों की
जो थी जीजाबाई की लोरियों में
और अहिल्या के घोड़ों की चापों में
जो वीरांगनाएं वीर को जन्म दे वीर ही बनती थी
नहीं हैं अब वह आंचल और न ही वे घोड़े
किंतु करोड़ों मानव रथ है
आज सपने वहीं संजोए
बस चाहिए तो अग्रणियों का दिशा सुचन
गुरु चाहिए चाणक्य और रामदास जैसे
जिसने दशा दिशा संभाली थी
आओ आज, हां आओ आज सभी जीजाबाई,अहल्या, चाणक्य और रामदास भी
जाग गयें हैं आज हम अब नहीं इंतजार
हमारे राष्ट्रीय पर्वों का
न क्षणिक हैं अब हमारा
जज्बा–ए– वतन
उठ चुके हैं टूटी हैं निंद्रा
खामोशी की तंद्रा छोड़
उगेगा सूरज इक दिन हमारी ही तपिशों से
खड़े राह में शिवाजी और चंद्रगुप्त महान भी
पुकार रहें हैं आज वो शिष्य
अपने गुरु जनों को
सिखाओ आज जो सिखाया हैं सदियों से संसार को

जयश्री बिरमी
अहमदाबाद


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