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हमे सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता

J. krishnamurti  हमें सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता बीसवीं सदी …


हमे सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता
J. krishnamurti 

हमें सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता

बीसवीं सदी के महान दार्शनिक जे कृष्णमूर्ति आज भुला दिया गया नाम है। 15 मई, 1895 को मद्रास और बेंगलुरु के बीच स्थित मदनापल्ली गांव में पैदा हुए कृष्णमूर्ति के दादा संस्कृत के विद्वान थे। माता कृष्णभक्त, धर्म-परायण और मृदु स्वभाव की थीं। साढ़े दस साल की उम्र में उनकी मां की मृत्यु हो गई थी। कृष्णमूर्ति हमेशा मलेरिया से पीड़ित रहते थे। लंबा जीवन जी सकें ऐसी आशा नहीं थी। वह रोजाना स्कूल नहीं जा सकते थे। पढ़ने में कमजोर थे। उनकी गिनती मंदबुद्धि बच्चों में होती थी। शिक्षक उनकी पिटाई करते थे।
बचपन से ही वह अंतर्मुखी थे। प्रकृति का बारीकी से निरीक्षण करते। खूब दयालु थे। स्कूल में गरीब बच्चों को अपनी पेन, पेंसिल, स्लेट और किताबें दे देते थे। घर आए भिखारियों को टोकरी भर कर चावल दे देते। घर की आर्थिक स्थिथि कमजोर थी। थिरोसाॅफिस्ट पादरी लेड बीटर ने बाल कृष्णमूर्ति को देखा तो उसमें उन्हें असाधारण शक्तियां नजर आईं। उन्हें कृष्णमूर्ति जीसस क्राइस्ट और भगवान बुद्ध की कोटि का लगा। थियोसोफिल सोसाइटी के उस समय के प्रमुख एनी बेसंट ने कृष्णमूर्ति को दत्तक ले कर उन्हें अंग्रेजी और अन्य विषय पढ़ाए। उन्हें शारीरिक रूप से सक्षम बनाया। उन्हें दीक्षा के लिए तालीम दी और पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजा। मैट्रिक में तीन बार फेल होने के बाद कृष्णमूर्ति ने पढ़ाई छोड़ दी।
15 साल की उम्र में कृष्णमूर्ति ने विश्वविख्यात पुस्तिका ‘श्री गुरुचरण’ लिखी। एनी बेसंट ने उन्हें जगदगुरु बनाने के लिए 1911 में ‘पूर्व के तारक संघ’ की स्थापना की। दुनिया भर के लोगों को उसका सदस्य बनाया। परंतु अगस्त, 1922 में उन्हें अनेक आध्यात्मिक अनुभव हुए।
दुनिया भर में फैली थियोसोफी की संस्थाओं में एक ‘आर्डर आफ द स्टार इन द ईस्ट ‘ का अध्यक्ष पद जे कृष्णमूर्ति को दिया गया था। परंतु जीवन की अंतर्ज्योति का दर्शन कर चुके जे कृष्णमर्ति ने उस पद का त्याग कर उन्होंने ऐसी शिक्षण संस्थाओं का निर्माण किया कि जहां विद्यार्थियों को संयम और सर्वांगी शिक्षा का पाठ पढ़ाया जाए। उनके प्यारे भाई नित्यानंद की 1925 में मृत्यु हो गई। अगस्त, 1929 में कृष्णमूर्ति ने जगदगुरु होने से मना कर दिया। उन्होंने ‘तारक संघ’ का विसर्जन कर दिया। संस्था को मिले दान को लौटा दिया। किसी भी संस्था, संघ, गुरु विचारधारा, मंत्रजाप, विधि और संप्रदाय को ‘सत्य’ का दुश्मन माना।
अब वह अमेरिका के कैलिफोर्निया स्टेट के ओहायो नामक नगर में स्थाई हो गए। दुनिया भर की यात्रा करते रहे। हर किसी को संस्था, मंडल या अनुयायियों के बिना अकेला जीवन रहने और मुक्त जीवन जीने का संदेश देते रहे।
कहा जाता है कि उनमें चमत्कारिक अलौकिक शक्तियां थीं। उनके हाथ के स्पर्श से ही बीमारियां दूर हो जाती थीं। पर वह अपनी इस शक्ति का भाग्य से ही उपयोग करते थे। वह स्पष्ट कहते थे कि चमत्कार और अध्यात्म का कोई संबंध नहीं है।
हालीवुड की एक फिल्म कंपनी ने उन्हें एक फिल्म में बुद्ध का अभिनय करने के लिए उस समय पांच हजार डालर का ऑफर किया था। जिसके लिए उन्होंने मना कर दिया था।
कृष्णमूर्ति खुद को किसी का गुरु नहीं मानते थे। खुद को वह मात्र ‘मार्गदर्शक’ मानते थे। वह कहते थे, “आप को खुद अपना दीप बनना है। आप खुद अपने मित्र और शत्रु हैं।” वह कहते थे कि जीवन की समस्याओं का मूल मन के अंदर जमा हुआ भूतकाल का स्तर ही है। पलपल की सदैव जागृति द्वारा ही मानव सुख-शांति से जी सकता है।
कृष्णमूर्ति के उस समय के मित्रों में तमाम सुप्रसिद्ध महारानियों से ले कर बौद्ध साधु भी थे। बर्नार्ड शाॅ, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और दलाई लामा भी थे। बर्नार्ड शाॅ ने कहा था, “कृष्णमूर्ति जैसा सुंदर आदमी मैं ने देखा नहीं है।”
खलिल जिब्रान ने कहा था,

 “कृष्णमूर्ति ने मेरे कमरे में प्रवेश किया तो मैं ने मन भी मन अनुभव किया कि साक्षात प्रेम के अवतार पधारे हैं।”
आल्डस हकसली ने कहा था, “कृष्णमूर्ति को सुनते हुए मुझ लग रहा था, मैं बुद्ध को सुन रहा हूं।”

जे कृष्णमूर्ति के ऐसे तमाम विधान हैं, जो याद करने लायक हैं। वह कहते थे, “25 लाख वर्ष पूर्व हम जंगली थे। आज भी सत्ता, प्रतिष्ठा की चाहत, दूसरे की हत्या, ईर्ष्या आदि स्वरूप में हम जंगली ही हैं। मेरे लिए यह बहुत बड़ी खोज है। मैं नहीं मानता कि मानव जाति में आमूल परिवर्तन हो।”
वह कहते थे, “लाखों वर्षों से हम जैसे थे, वैसे ही हैं। लोभी, ईर्ष्यालु, आक्रामक, अनदेखा, चिंतातुर और हताश… हम धिक्कार, भय और नम्रता का विचित्र मिश्रण हैं। हम हिंसा और शांति दोनों हैं। हम ने बैलगाड़ी से ले कर विमान तक की प्रगति की है, परंतु मानसिक रूप से जरा भी नहीं बदले। हमें सुंदर घर तो बनाना आता है, परंतु उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता। दुनिया के लोग भले शांति, प्रेम, अहिंसा, दया, भाईचारा की बातें करते हों, पर इस जगत में सब उल्टा ही चल रहा है। बेबिलोन में खुदाई के दौरान वर्षों पूर्व का पत्थर का एक अवशेष मिला था। जिस पर लिखा था, ‘यह अंतिम युद्ध होगा, परंतु उसके बाद पांच हजार युद्ध हुए और अभी भी चल रहे हैं। हर नए युद्ध में पहले के युद्ध की अपेक्षा अधिक से अधिक संपत्ति और मनुष्यों को क्रूरतापूर्ण खत्म किया जा रहा है। उनके कहने का तात्पर्य यह था कि यह जगत जंगल जैसा है, उजड्ड रण जैसा भी है, अंधकारमय भी है।
वह कहते थे, “मात्र पुस्तक की पढ़ाई भरोसेमंद नहीं होती। भरोसा अंतर्मन से आना चाहिए। आप अपना महत्व नहीं बढ़ाएंगे, धन और कीर्ति का ढ़ेर नहीं जमा करेंगे, जीवन को स्वर्ण बनाने के बजाय कबाड़ की तरह जीवन को कभी नहीं बनाएंगे। आप को जीवन की समग्रतया समझनी होगी। उसके एक छोटे हिस्से के लिए नहीं। इसके लिए आप को पढ़ना चाहिए, आप को आकाश में देखना चाहिए, आप को गाना चाहिए, आप को नृत्य करना चाहिए, कविताएं लिखनी चाहिए और दुख भी सहन करना चाहिए, जिससे जीवन को समझा जा सके।”
वह कहते थे, “बड़ी से बड़ी कला यानी जीवन जीने की कला। जीवन यानी संघर्ष, अशांति और दुख- ऐसी वाहियात मान्यताएं जीवनघर को बुझा नहीं सकतीं। जीवन कितना सुंदर, अद्भुत और जीने लायक है, इसका हमें भान नहीं है। पूर्वजन्म में प्रभु ने पाप की इस जीवन में शिक्षा दी ऐसी मान्यता जलते जीवनघर को बुझने नहीं देती। जीवन जीने की कला क्या है, यह जानने का हमारे पास समय ही नहीं है। वैज्ञानिक बनने के लिए हम वर्षों वर्ष खपा देते हैं, आश्रमों में जा कर बाकी का जीवन उसमें समर्पित कर देते हैं और जीवन निर्वाह के लिए कमाई करने में पूरा जीवन खर्च कर डालते हैं, परंतु जीवन जीने की कला क्या है, यह जानने के लिए हम जीवन का एक दिन भी नहीं खर्च करते। इसलिए जीवन जीने की कला अवश्य सीखनी चाहिए।
ऐसे क्रांतिकारी दार्शनिक जे कृष्णमूर्ति का 17 फरवरी, 1986 को अमेरिका के कैलिफोर्निया स्टेट के ओहायो नगर में देहावसान हो गया था।
उनके अग्निदाह के समय पहले से व्यक्त की गई उनकी इच्छा के अनुसार मात्र सात व्यक्ति ही ऊपस्थित थे। सेंट जेवियर्स कालेज के अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व प्राध्यापक बबाभाई पटेल ने जे कृष्णमूर्ति के बारे में अनेक पुस्तकें लिखी हैं। यहां दी गई जानकारी उनके और गुर्जर ग्रंथ रत्न कार्यालय के सौजन्य से दी गई है।

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वीरेन्द्र बहादुर सिंह जेड-436ए सेक्टर-12, नोएडा-201301 (उ0प्र0) मो-8368681336

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