Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

kishan bhavnani, lekh

स्वयं को छोटा कहलाने वाला व्यक्ति सबसे श्रेष्ठ गुणवान

स्वयं को छोटा कहलाने वाला व्यक्ति सबसे श्रेष्ठ गुणवान होता है आओ निंदा त्यागने का संकल्प लें आओ हम खुद …


स्वयं को छोटा कहलाने वाला व्यक्ति सबसे श्रेष्ठ गुणवान होता है

स्वयं को छोटा कहलाने वाला व्यक्ति सबसे श्रेष्ठ गुणवान

आओ निंदा त्यागने का संकल्प लें

आओ हम खुद का आंकलन दूसरे से श्रेष्ठ करने के अभिमान से बचें – एडवोकेट किशन भावनानी गोंदिया

गोंदिया – सृष्टि में खूबसूरत मानवीय जीव की रचना कर रचनाकर्ता नें उसमें गुण और अवगुण रूपी दो गुलदस्ते भी जोड़े हैं और उनका चयन करने के लिए 84 लाख़ योनियों में सर्वश्रेष्ठ बुद्धि का सृजन मानवीय योनि में कर अपने भले बुरे सोचनें का हक उसी को दिया है परंतु हम अपनीं जीवन यात्रा में हम देखते हैं कि मानवीय जीव अवगुण रूपी गुलदस्ते का चुनाव खुद कर उसमें ढल जाता है और अंत में दोष सृष्टि रचनाकर्ता को ही देता है कि मेरे जीवन को नरक बना दिया जबकि गलती मानवीय जीव की ही है कि उसने ही अपनी बुद्धि से उस अवगुण रूपी गुलदस्ते को चुना। यूं तो अवगुणों को सैकड़ों शब्दों, बुराइयों से पुकारा जाता है जिसमें आज हम निंदा बुराई, दूसरों पर उंगली उठाना इस अवगुण की चर्चा कर करेंगे आओ निंदा रूपी अवगुण त्यागने का संकल्प लें।
साथियों बात अगर हम निंदा की करें तो किसी ने खूब ही कहा है कि, संसार में प्रत्येक जीव की रचना ईश्वर अल्लाह ने किसी उद्देश्य से की है। हमें ईश्वर अल्लाह की किसी भी रचना का मखौल उड़ाने का अधिकार नहीं है। इसलिए किसी की निंदा करना साक्षात परमात्मा की निंदा करने के समान है। किसी की आलोचना से आप खुद के अहंकार को कुछ समय के लिए तो संतुष्ट कर सकते हैं किन्तु किसी की काबिलियत, नेकी, अच्छाई और सच्चाई की संपदा को नष्ट नहीं कर सकते। जो सूर्य की तरह प्रखर है, उस पर निंदा के कितने ही काले बादल छा जाएं किन्तु उसकी प्रखरता, तेजस्विता और ऊष्णता में कमी नहीं आ सकती।
साथियों बात अगर हम खुद का आंकलन दूसरों से सर्वश्रेष्ठ करने की करें तो, अपनी प्रशंसा तथा दूसरों की निंदा असत्य के समान है। जैसे हमारी आंखें चंद्रमा के कलंक तो देख लेती हैं , किंतु अपने काजल को नहीं देख पातीं। उसी प्रकार हम दूसरों के दोषों को देखते हैं , हालांकि खुद अनेक दोषों से भरे हैं। दूसरों में जो दोष दिखाई देते हैं , सचमुच उनका कारण हमारे अपने चित्त की दूषित वृत्तियां ही है। दूसरों की निंदा किसी भी दृष्टि से हितकर नहीं होती। इस संबंध में एक कवि ने लिखा भी है कि हमें परखने का तरीका नहीं है। कोई वरना दुश्मन किसी का नहीं है। निंदक को यह याद रखना चाहिए कि दुनिया तुझे हजारों आंखों से देखेगी , जबकि तू दुनिया को दो ही आंखों से देख सकेगा।
साथियों बात अगर हम दूसरों पर एक उंगली उठाने की करें तो, जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के दोषों पर उंगली उठाता है , तो उसे याद रखना चाहिए कि पीछे की और मुड़ी उसकी तीन उंगलियां पहले उसी की ओर संकेत कर रही होती हैं। निंदा- चुगली व्यर्थ ही है। इससे परस्पर वैमनस्य , कटुता और संघर्ष बढ़ते हैं। इसीलिए कहा है कि दूसरों के कृत्याकृत्यों को न देखो , केवल अपने ही कृत्यों का अवलोकन करो। यूं तो लोग चुप रहने वाले की निंदा करते हैं। बहुत बोलने वाले की निंदा करते हैं , मितभाषी की निंदा करते हैं , संसार में ऐसा कोई नहीं है , जिसकी निंदा न होती हो, इसीलिए कहा है- जैसी जाकी बुद्धि है , तैसी कहै बनाय। ताको बुरा न मानिए , लेन कहां यूं जाए। ‘ केवल दूसरों द्वारा अपनी निंदा सुनकर मनुष्य अपने को निंदित न समझें , वह अपने आप को स्वयं ही जाने , क्योंकि लोक तो निरंकुश है , जो चाहता है सो कह देता है। द्वेषी गुणं न पश्यति , दोषी गुणों को नहीं देखता।
साथियों बात अगर हम परनिंदा में आनंद की करेंतो परनिंदा में प्रारंभ में काफी आनंद मिलता है लेकिन बाद में निंदा करने से मन में अशांति व्याप्त होती है और हम हमारा जीवन दुःखों से भर लेते हैं। प्रत्येक मनुष्य का अपना अलग दृष्टिकोण एवं स्वभाव होता है। दूसरों के विषय में कोई अपनी कुछ भी धारणा बना सकता है। हर मनुष्य का अपनी जीभ पर अधिकार है और निंदा करने से किसी को रोकना संभव नहीं है। न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन: काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।। अर्थ – लोगों की निंदा (बुराई) किये बिना दुष्ट (बुरे) व्यक्तियों को आनंद नहीं आता। जैसे कौवा सब रसों का भोग करता है परंतु गंदगी के बिना उसकी संतुष्टि नहीं होती, लोग अलग-अलग कारणों से निंदा रस का पान करते हैं। कुछ सिर्फ अपना समय काटने के लिए किसी की निंदा में लगे रहते हैं तो कुछ खुद को किसी से बेहतर साबित करने के लिए निंदा को अपना नित्य का नियम बना लेते हैं। निंदकों को संतुष्ट करना संभव नहीं है।
साथियों बात अगर हम निंदा पर वैश्विक विचारों की करें तो, महात्मा गांधी ने भी कहा है कि दूसरों के दोष देखने की बजाय हम उनके गुणों को ग्रहण करें। दूसरों की निंदा अश्रेयस्कारी है। निंदा करने व सुनने में व्यक्ति प्राय: आनंद लेता है। जबकि निंदा सुनना व निंदा करना, दोनों ही विषय है। इसीलिए हमारे महापुरुषों ने तो कहा है ‘ सपनेहां नहिं देखा परदोषा! ‘ अर्थात् स्वप्न में भी पराये दोषों को न देखना। भगवान बुद्ध ने कहा है , जो दूसरों के अवगुणों की चर्चा करता है , वह अपने अवगुण प्रकट करता है। भगवान महावीर ने भी कहा है कि किसी की निंदा करना पीठ का मांस खाने के बराबर है। विधाता प्राय: सभी गुणों को किसी एक व्यक्ति या एक स्थान पर नहीं देता है। ईसा मसीह ने कहा था ,लोग दूसरों की आंखों का तिनका तो देखते हैं, पर अपनी आंख के शहतीर को नहीं देखते। हेनरी फोर्ड ने कहा कि मैं हमेशा दूसरों के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करता हूं। हमारी सद्भावना या दुर्भावना ही किसी को मित्र या शत्रु मानने के लिए बाध्य करती है। सद्भावना अनुकूल स्थिति के कारण होती है और दुर्भावना प्रतिकूल स्थिति के कारण होती है। लोगों के छिपे हुए ऐब जाहिर मत करो। इससे उसकी इज्जत तो जरूर घट जाएगी, मगर तेरा तो ऐतबार ही उठ जाएगा।
साथियों बात अगर हम दूसरों के दोष ढूंढना, निंदा करना मानवीय स्वभाव की करें तो, दूसरों की निंदा करना। सदैव दूसरों में दोष ढूंढते रहना मानवीय स्वभाव का एक बड़ा अवगुण है। दूसरों में दोष निकालना और खुद को श्रेष्ठ बताना कुछ लोगों का स्वभाव होता है। इस तरह के लोग हमें कहीं भी आसानी से मिल जाएंगे। प्रतिवाद में व्यर्थ समय गंवाने से बेहतर है अपने मनोबल को और भी अधिक बढ़ाकर जीवन में प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहें। ऐसा करने से एक दिन आपकी स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी और आपके निंदकों को सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। इसलिए सब तरफ गुण ही ढूंढने की आदत डालो। देखो कितना आनंद आता है। दुनिया में पूर्ण कौन है हरेक में कुछ न कुछ त्रुटियां रहती हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:। काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।स्वयं को छोटा कहलाने वाला व्यक्ति सबसे श्रेष्ठ गुणवान होता है।आओ निंदा त्यागने का संकल्प लें।आओ हम खुद का आंकलन दूसरे से श्रेष्ठ करने के अभिमान से बचें।

About author

kishan bhavnani

कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट 

किशन सनमुख़दास भावनानी 

Related Posts

सोचिये चैटजीपीटी पर; कितने खतरे, कितने अवसर| chat GPT par kitne khatre kitne avsar

February 19, 2023

 सोचिये चैटजीपीटी पर; कितने खतरे, कितने अवसर। जब भी कोई नया अविष्कार या तकनीक आती है तो उसको लेकर तमाम

आध्यात्मिकता जीवन का आधार है

February 16, 2023

जब हम जग मे आए जग हसां हम रोए।ऐसी करनी कर चलो हम जाए जग रोए ।। आध्यात्मिकता जीवन का

पशु चिकित्सा को चिकित्सा की जरूरत

February 16, 2023

पशु चिकित्सा को चिकित्सा की जरूरत सूदूर ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं को पशु चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध करवाना बहुत जरूरी है।

कविता: भारतीय संस्कृति में नारी | bharatiya sanskriti me naari

February 16, 2023

 भावनानी के भाव कविता:भारतीय संस्कृति में नारी  भारतीय संस्कृति में नारी  लक्ष्मी सरस्वती पार्वती की रूप होती है समय आने

मेहनत की सिसकियाँ, नक़ल माफिया और राजनीतिक बैसाखियाँ

February 16, 2023

मेहनत की सिसकियाँ, नक़ल माफिया और राजनीतिक बैसाखियाँ नकल विरोधी कानून सरकार की एक अच्छी पहल है परंतु इसमें एक

वैश्विक पटल पर भारत तीव्रता से बढ़ रहा है

February 16, 2023

 भावनानी के भाव वैश्विक पटल पर भारत तीव्रता से बढ़ रहा है रक्षा क्षेत्र में समझौतों के झंडे गाड़ रहे

PreviousNext

Leave a Comment