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सौ क्विंटल के तीन फल , अरे कैसे ?

सौ क्विंटल के तीन फल , अरे कैसे ? अरे ! सच आज मैं बहुत बड़ी सोच मे उलझ गयी …


सौ क्विंटल के तीन फल , अरे कैसे ?

अरे ! सच आज मैं बहुत बड़ी सोच मे उलझ गयी हूं , और खुद से ही सवाल कर रही कि सिर्फ तीन फल सौ क्विंटल के कैसे हो सकते हैं ? जवाब ही नहीं मिल रहा । पर जब जवाब मिला तो सोचा चलो आप सभी संग अब मैं अपने ही सवाल का जवाब जो मिला , उसे साझा करूं । हां भाई मात्र तीन फल हो सकते हैं , सौ क्विंटल के , परंतु सिर्फ और सिर्फ किसी भी सामाजिक संस्थाओं के लिए , अधिकारियों के लिए । अब जानिए कैसे , आज के समय में हर राज्य के हर शहर में आपने देखा होगा कि कोई ना कोई सामाजिक संस्थाएं होती ही है यहां तक की छोटे गांव में भी सामाजिक संस्थाओं का गठन किया जाता है । जिसके माध्यम से गरीब लोगों के लिए कोई न कोई समाज सेवा से जुड़ा कार्य करते हुए उन्हें आगे बढ़ाने का कार्य कराया जाता है यह तो बहुत ही खुशी की बात है । उनकी शिक्षा के प्रति भी ध्यान दिया जाता है , वृक्षारोपण की तरफ भी ध्यान दिया जाता है और बहुत सी बातें ही जहां सामाजिक सेवा संस्थाओं द्वारा मदद दी जाती है समय-समय पर जिसके चलते बहुत लोग लाभान्वित हुए हैं । जिनके नसीब मे शिक्षा दूर-दूर तक नहीं है वह भी आज सामाजिक सेवाओं की मदद से पढ़ कर आगे बढ़ रहे हैं अब यहां बात आती है मात्र तीन फल 100 क्विंटल के बराबर कैसे हुए । हाल ही में मैं अपने छोटे बेटे के मोबाइल में एक हंसी मजाक का वीडियो देख रही थी जिसमें कार्टून बनाकर उसके साथ एक मजाकिया पंक्तियों को लिखा गया था । वह चित्र यह था कि एक सामाजिक संस्था अस्पताल में मरीजों को देखने गई है साथ में कोई एक अधिकारी भी थे और वह लोग मरीज को सामाजिक सेवा का नाम देते हुए मात्र एक छोटी सी पन्नी में तीन फल दे रहे थे । कुल 9 पदाधिकारी और एक अधिकारी (अतिथि) जब वो फल मरीज़ को दिया जा रहा था तो सभी ने मिलकर उस पन्नी को हाथ मे पकड़ते हुए पलंग पर लेटे मरीज को दिया मरीज ने भी पन्नी पर हाथ रखा और दूसरा बाजू वाले मरीज के रिश्तेदार या फोटोग्राफर को फोन देकर कहा कि आप फोटो खींचों । उन लोगों ने फल देते समय फोटो खींचवाया । आप बताइए सवाल मेरे जेहन में जो उठा उसका उत्तर आप पाठकों को भी समझ मे आ गया होगा सही है कि नहीं मेरा उत्तर । मात्र 3 फल देने के लिए मरीज को नौ समाजसेवीयों और एक अधिकारी मतलब कुल दस लोगों के द्वारा उठा कर देना 100 क्विंटल के बराबर हुआ , कि नहीं हुआ । आज कल समाज सेवा के नाम पर समाज सेवा कम और दिखावे का प्रचलन हो गया है । जिसके चलते मुझे ऐसा लगता की सामाजिक सेवा संस्थाओं का एक चौथाई पैसा या हो सकता है उससे अधिक ही पैसा फोटो बनवाने में ही खर्च करता चला जाता होगा , एक संस्था जिससे मैं भी जुड़ी थी *नाम लिखना मेरी फितरत मे नही* समाज सेवा के नाम पर दूर-दूर के क्षेत्रों मे बस में भरकर संस्था से जुड़े कार्य कर्ताओं को लेकर बसों मे या कारों में जैसे भी सुविधा मिले लेकर जाते और वहां के क्षेत्र के लोगों मे पुराने कपड़े , सीदा सामग्री देने लगे और कम से कम सौ से सवा सौ फोटो खींचे , अब वो क्षेत्र हमारे शहर से पचास से साठ किलोमीटर दूर था , अब ये सोचिये की इतना दूर किराया खर्चा करके जाना सिर्फ पुराने कपड़े व सीदा सामग्री देने के लिए कहां की और कैसी समझदारी है ? अरे सबसे पहले तो आप अपने ही शहर मे फुटपाथ पर रहने वाले या बस्ती में रहने वाले या सिग्नलों पर बच्चे जो भीख मांग रहे उनके लिए तो कुछ करें । अपने शहर की स्थिति तो सुधारना नहीं बल्कि दूर दूर जाकर समाज सेवा के नाम पर फोटो सेशन करना और दुनिया को पेपर बाजी कर चीख चीख कर बताना कि हमारी संस्था फलाने गांव या कस्बे में गयी और ये महान कार्य किया । हर समाजसेवी संस्था समाज सेवा के नाम पर , कोई गौशाला जा रहा , तो कोई अनाथ आश्रम तो कोई वृद्धाश्रम वगैरह वगैरह अरे करना है किसी जरूरतमंद के लिए तो ऐसा काम करो कि सच उसमें से किसी का जीवन ज़मीं से उठ कर आसमां तक पहुंच जाए । कहने का तात्पर्य यह है कि समाज सेवा करें , फोटो सेशन भी करें पर तीन फलों को सौ क्विंटल का बनाते हुए किसी मरीज या गरीब का मज़ाक़ बनाते हुए, पेपर बाजी करते हुए नहीं । मेरा लिखना सरल है , पर समाजसेवी बन समाज सेवा करना मुश्किल है । अगर आप समाज सेवा करना चाहते हैं तो संस्था के मर्यादित बजट अनुसार कुछ लोगों को गोद ले लो और सिर्फ उनके लिए काम करें सौ के लिए करने से बेहतर है बजट अनुसार दस के लिए कर उनका जीवन स्वर्ग बना दो जब वो दस का जीवन बेहतर बन कमाने लगे तो उनको बोलो अब आप अगले दस , पांच जितने लोगों कि मदद् कर सकते करें बस बनती और बढ़ती जाएगी ये चैन दस काम ना करें समाज सेवा के नाम पर कोई भी एक काम या दो काम ले निःस्वार्थ भाव से कर लिया तो आपकी समाज सेवा सफल मानव जीवन भी सफल और आपका संस्था निर्माण भी करना सफल । बस मेरी कलम को और मेरी सोच को काग़ज़ों पर उतारने बैठ गई । हां यही तो बुराई है मुझमें की जो तूफ़ान दिल को अशांत कर दे , उस तूफान को सिर्फ मेरी कलम लिख कर शांत कर सकती है । लेखिका हूं ना सच के आईने से रू-ब-रू करवाना मेरा फ़र्ज़ बाकी जो ना माने सो माने और जो ना माने सो ना माने अपनी अभिव्यक्ति को रखने का मुझे मानवाधिकार प्राप्त है । इसलिए अपनी बात रखी । शेष शुभ सभी समझदार ।

About author

Veena advani
वीना आडवाणी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र

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