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Jitendra_Kabir, poem

सोचो जरा उनके बारे में भी- जितेन्द्र ‘कबीर’

सोचो जरा उनके बारे में भी तुम दुखी होकि इन सर्दियों में महंगीब्रांडेड रजाई नहीं खरीद पाए,जिन्हें मयस्सर नहींकड़कती सर्दी …


सोचो जरा उनके बारे में भी

तुम दुखी हो
कि इन सर्दियों में महंगी
ब्रांडेड रजाई नहीं खरीद पाए,
जिन्हें मयस्सर नहीं
कड़कती सर्दी में शरीर पर
एक अदद कपड़ा,
कभी सोचा है
कितने दुखी होंगे वो?

तुम दुखी हो
कि वजन कम नहीं हो रहा
महंगे तरीके अपनाकर भी,
जिन्हें मयस्सर नहीं
खाने को दो जून की रोटी,
कभी सोचा है
कितने दुखी होंगे वो?

तुम दुखी हो
कि महंगी गाड़ियां नहीं हैं
तुम्हारे पास अभी,
जिन्हें मयस्सर नहीं
चलने के लिए पांव में
चप्पल भी,
कभी सोचा है
कितने दुखी होंगे वो?

तुम दुखी हो
कि काम के चलते
वक्त नहीं मिलता तुम्हें
जिंदगी का आनंद लेने का,
जिन्हें मयस्सर नहीं
भरोसा अगले पल का
कि कब जैसे गोलीबारी
बमबारी हो जाए,
कभी सोचा है
कितने दुखी होंगे वो?

जितेन्द्र ‘कबीर’
साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’
संप्रति-अध्यापक
पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश
संपर्क सूत्र – 7018558314


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