Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Bhawna_thaker, lekh

शादी के बाद क्यूँ बदल जाती है बेटियों की पहचान

“शादी के बाद क्यूँ बदल जाती है बेटियों की पहचान” “किसने बनाई यह रस्में, किसने बनाए रिवाज़? बेटियों के वजूद …


“शादी के बाद क्यूँ बदल जाती है बेटियों की पहचान”

“किसने बनाई यह रस्में, किसने बनाए रिवाज़? बेटियों के वजूद को मिटाने की साज़िश थी, या थी महिलाओं को जूती के नीचे दबाए रखने की ख़्वाहिश”
सारी परंपराएं, सारे रिवाज़ और सारी बंदीशें सिर्फ़ स्त्रियों के लिए ही क्यूँ? सदियों से थोपी गई रवायत को महिलाएं भी ढ़ोती आ रही है। क्यूँ कभी किसीने एक भी परंपरा तोड़ने की कोशिश नहीं की? क्यूँ पुरुषों का आधिपत्य स्वीकार करते आज भी कुछ महिलाएँ खुद को मर्दों से एक पायदान नीचे ही पाती है। बात यहाँ मर्दों का स्थान जताने की नहीं, समान हक की है। सिर्फ़ कागज़ो पर समानता और हक की बातें रह गई है, पितृसत्तात्मक वाली सोच से कब निजात मिलेगा।
पति से तलाक हो जाने के बाद भी, या पति के छोड़ देने के बाद भी बच्चों के नाम के पीछे क्यूँ पिता का ही नाम लगाया जाता है? जब कि कई बार देखा जाता है कि, माँ ही दो तीन बच्चों को अकेले हाथों पालती है, फिर भी बच्चों के हर दस्तावेज में पिता का नाम अनिवार्य होता है।
आख़िर क्यूँ शादी के बाद लड़कियों का पूरा अस्तित्व नष्ट हो जाता है? घर से लेकर सरनेम और गोत्र तक बदल जाता है। कई-कई ससुराल वाले तो नाम पसंद न आने पर बहूओं के नाम तक बदल देते है, ज्योत्सना की जगह जूही बना देते है। पिता के नाम की आदी गुड़िया के नाम के पीछे शादी के बाद सभी सरकारी दस्तावेजों में पिता के स्थान पर पति का नाम दर्ज हो जाता है, क्यूँ पति का नाम पत्नी के आधार कार्ड में नहीं जुड़ता। क्यूँ किसीने इस बदलाव के बारे में नहीं सोचा?
लड़कियों की भावनाएं सच में आहत होती है, ये इतना आसान भी नहीं होता नाम और सरनेम बदलने को लेकर बच्ची के एहसास जुड़े होते है। बहुत ही अजीब लगता है जब कोई दूसरे नाम से बुलाता है। शुरू-शुरू में ध्यान भी नहीं रहता की किसे बुला रहे है।
बेशक शादी परिवार के सूत्र में पिरोती है, एक मिट्टी में पली बड़ी एक लड़की के वजूद को उखाड़ कर समूची अन्जानी मिट्टी में गाड़ देते है। नये रिश्तों की नींव रखते ही जन्म से जुड़े सारे रिश्ते पीछे छूट जाते है। सबसे पहले पत्नी बनती है, बहू कहलाती है, एक खानदान की लाज बन जाती है जबकि पति की पहचान पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
जब बेटी के नाम के पीछे से पिता का नाम हटकर पति का लग जाता है तब बाप और बेटी दोनों के मन में दर्द की कश्मकश होती है। शादी के बाद लड़कियों के लिए सरनेम बदलना क्यूँ अनिवार्य हो जाता है? इसकी क्या ज़रूरत है या फिर ये केवल परंपरा के नाम पर होता है? या फिर इसे पुरुषों के वर्चस्व को स्थापित करने का प्रमाण मान लिया जाए। क्यूँ लड़कियां ताज़िंदगी जन्म से मिले नाम और सरनेम के साथ नहीं जी सकती। क्या औरतें नाम बदलकर पति के प्रति अपना समर्पण जाहिर करती है? या परंपरा के नाम पर अपना अस्तित्व कुर्बान करती है? ये समर्पण पूरवार करता है की पूरा समाज इस बात को मानता है की महिलाएं पुरुषों से कमतर है। अब एक नया फैशन चला है शादी के बाद लड़कियां दोनों सरनेम लगाती है पहले पिता की बाद में पति की। चलो इस बदलाव को मान्य रखते है की कम से कम आपने जन्म से मिली पहचान को बचाने में कामयाब रही है।
शादी के बाद एक महिला अपना सरनेम बदलना चाहती है या नहीं ये उसकी खुद की मर्जी होनी चाहिए है, इसमें उस पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकता। ये उनका कानूनी अधिकार भी है, लेकिन फिर भी महिलाएं चाहकर भी इसका खुलकर विरोध नहीं कर पा रही है, तो इसे उसकी कमज़ोरी ही मान लेनी चाहिए, जबकि महिलाएं मर्दों के मुकाबले कहीं पर कमतर नहीं। आज हर क्षेत्र में मर्दों के कँधों से कँधा मिलाकर अपना लोहा मनवा रही है। फिर भी अपने नाम के पीछे पति का नाम और सरनेम ही स्त्री की पहचान कहलाती है। शायद इस परंपरा को तोड़ने में समाज को ओर सदियाँ लगेगी।

About author

Bhawna thaker
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

Related Posts

अपराध की पराकाष्ठा – लाइव कैमरे पर हत्या – आरोपियों का स्वयंभू सरेंडर !

April 19, 2023

अपराध की पराकाष्ठा – लाइव कैमरे पर हत्या – आरोपियों का स्वयंभू सरेंडर ! रोंगटे खड़े खड़े कर देने वाली

माफियागिरी @ एनकाउंटर

April 19, 2023

माफियागिरी @ एनकाउंटर अपराधियों में डर का माहौल, सुरक्षा एजेंसियों के लिए संजीवनी बूटी माफियाओं के खिलाफ सख़्त कार्रवाई से

18 वर्ष की उम्र @ हाई प्रोफाइल हत्या !

April 19, 2023

18 वर्ष की उम्र @ हाई प्रोफाइल हत्या ! नवज़वानों, बच्चों के ग़लत रास्ते पर जाने पर हर घर, हर

अपराध ज़गत दहशत में आया

April 19, 2023

अपराध ज़गत दहशत में आया जाने-अनजाने प्लस डायरेक्टली इंडायेक्टली इक्वल टू माफियाओं आतंकियों अपराधियों को कठोर संदेश त्वरित, फास्ट्रेक कार्रवाई

कृषि रोबोट: किसानों का किफायती दोस्त

April 19, 2023

कृषि रोबोट: किसानों का किफायती दोस्त कृषि क्षेत्र में भारत में किसान घट रहे हैं। कुछ सामान्य वाक्यों को दोहराकर

भारतीय बैंकों में ज़मा 35012 करोड़ का 10 वर्षों से कोई दावेदार नहीं आया

April 10, 2023

सुनिए जी ! बैंक से अपने पैसे तो वापस लेजाइए ! भारतीय बैंकों में ज़मा 35012 करोड़ का 10 वर्षों

PreviousNext

Leave a Comment