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Jayshree_birmi, poem

शहरों की शान

शहरों की शान आज गुजर रहा था सड़क परएक वृद्ध को गाड़ी से होती टक्करसब भागे जा रहे थे अपने …


शहरों की शान

आज गुजर रहा था सड़क पर
एक वृद्ध को गाड़ी से होती टक्कर
सब भागे जा रहे थे अपने पथ पर
तब लगा मुर्दों के शहर में रहता हूं मैं

चार रास्ते पर भीख मांगती लड़की
दिखा के अपने जिस्म और अंग को
देख कर सब भीख दे रहे थे तब
लगा मुझे मुर्दों के शहर में रहता हूं मैं

शादी के पंडाल के बाहर लगा था
जूठे खाने का भंडारा उनके लिए
जो गरीब बच्चे लूट लूट खा रहे थे तब
लगा मुझे मैं मुर्दों के शहर में रहता हूं

सारे आम किसी लड़की को छेड़ते
लड़कों को देख अपने अपने रास्ते
जातें हुएं लोगों को देख कर
लगा मुझे मैं मुर्दों के शहर में रहता हूं

देश की संपत्ति को जला कर नुकसान
कर के अपनी मांगे रखने वालें युवान
को देख दिल जला रहा था सोचो युवा
अपना किस रास्ते जा रहा था
लगा मैं मुर्दों के शहर में रहता हूं

छोड़ वृद्ध माता पिता को बच्चे
जब क्लब और पार्टियों में चले
जाते हैं मां बाप जब उन्हें बोझ
लगने लगते हैं तब
लगा मुझे मैं मुर्दों के शहर में रहता हूं

About author

Jayshree birimi
जयश्री बिरमी
अहमदाबाद (गुजरात)

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