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राजनीति और नैतिक मूल्य| rajneetik aur naitik mulya

राजनीति और नैतिक मूल्य सन 1908 में गाँधी जी ने अपने विचार जनता के सामने “हिन्द स्वाराज” के नाम से …


राजनीति और नैतिक मूल्य

सन 1908 में गाँधी जी ने अपने विचार जनता के सामने “हिन्द स्वाराज” के नाम से गुजराती में एक पुस्तक लिखकर व्यक्त किए और सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका में अपने पत्र “इण्डियन ओपिनियन” में उन्हें प्रकाशित किया। गाँधी जी ने जिस स्वतंत्र भारत का सपना देखा था उसका आधार देश में केवल स्वतंत्रता दिलाना ही नहीं था, अपितु हर नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन बिताने का अवसर प्रदान करना था। छींटे-छींटे गाँवों को भारतीय संस्कृति के आधार पर संपन्न बनाना था और जिसके सम्बन्ध में उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि हमको अंग्रेज़ों से ही नहीं, अंग्रेज़ियत से भी स्वतंत्रता प्राप्त करनी है और इस स्वतंत्रता का सूत्र सत्य, अहिंसा और प्रेम ही हो सकता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि मनुष्य का उत्थान चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक हो, केवल नैतिक आचरण के द्वारा ही हो सकता है। उन्होंने सत्य और अहिंसा का मंत्र देश के सामने रखा और एक नया शास्त्र सत्याग्रह और असहयोग के रूप में देश के समक्ष रखा। उनके विचार से जनतंत्र में आस्था रखने वालों को अनुशासनशील होना और अपने को देश की सेवा में अर्पित करना अत्यंत आवश्यक था।

गाँधी जी यह मानते थे कि व्यक्ति का धर्म और उसकी राजनीति दे अलग-अलग चीज़ें हैं। धर्म को वह व्यक्तिगत मामला मानते थे। गाँधी जी के विचार जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के बारे में बहुत ही स्पष्ट थे और उन्होनें भारत की स्वतंत्रता का संघर्ष इन्हीं आदर्शों पर लड़ा, जिसमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के साधन की पवित्रता पर वह सदैव बल देते रहे। 1947 के बाद जब संविधान सभा बैठी तो उस समय गाँधी जी की विचारधारा, जिसके अन्तर्गत उन्होनें स्वतंत्रता संग्राम का संचालन किया था, संविधान सभा के सदस्यों के सम्मुख थी। उनको नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं था, अतः भारत के संविधान ,में गाँधी जी के विचारों की चाप उसकी प्रस्तावना में, उसके मूल अधिकारों में और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के प्राविधानों में स्पष्ट मिलती है।

प्रस्तावना के अनुसार भारत को पूर्ण प्रभुतासम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाना स्वीकार किया गया। देश के नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार-अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र और अखंडता सुनिश्चित करने वाली विश्वबंधुत्व बढ़ाने के लिए, संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित आत्समर्पित किया गया है। यदि हम राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को देखें तो गाँधी जी के स्वतंत्र भारत के सपने का उल्लेख हमें मिलता है। राज्य से अपेक्षित है कि वह ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करें जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन के सभी संस्थाओं को प्रभावित कर सके और कल्याण की वृद्धि हो सके।

गाँधी जी के सपनों के समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं ग्राम पंचायतों का गठन, मद्य निषेध, पर्यावरण का संरक्षण, वनों की रक्षा, नागरिकों के लिए समान सिविल कोड, अनुसूचित व जनजातियों के हितों की रक्षा, कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण इत्यादि का उल्लेख पूर्ण रूप से संविधान के इन प्रावधानों से होता है।

प्रश्न यह है कि आज भी सात दशक से भी ज्यादा समय की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति क्या है ? वैसे हमारे सत्ताधारी तथा अन्य राजनितिक दाल देश की आर्थिक प्रगति और सामाजिक उत्थान की बात करते ऊबते नहीं है। हम यह भूल गए हैं कि अनुशासनहीन, पदलोलुप, स्वार्थी और अवसरवादी राजनीतिज्ञों ने देश को ऐसे स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया है कि जनतंत्र इस देश में कायम रहेगा, यह संदेह अनेक लोगों को होने लगा है। कुछ लोग यह भी कहने लगे हैं कि जनतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था इस देश के लिए उपयोगी व्यवस्था है भी नहीं। राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता और साधनों की पवित्रता समाप्त सी हो गई है। धन कमाना और संचय करना जीवन का एकनिष्ठ लक्ष्य बन कर रह गया है। अंग्रेज़ियत हम में और हम उसमें समा से गए हैं क्योंकि हमारे पढ़े-लिखे, असभ्य और आधुनिक होने की एक मात्र मापदण्ड यही रह गई है। संविधान के प्रावधानों को इधर-उधर मोड़ कर दल के हितों में कैसे इस्तेमाल किया जाए, यही प्रक्रिया कमोबेश हर जगह दिखने लगी है। यह तो अकाट्य सत्य है कि बिना गंभीर जागरूकता और कर्तव्यनिष्ठा के कोई भी परिवर्तन को लाना आशातीत है। नैतिकता पर आधारित राजनीति, स्वार्थहीन और सबके लिए लाभदायक आर्थिक नीति, पवित्र साधन पर आधारित शासन व्यवस्था, गाँधी जे के सपने के अनुरूप ग्राम राज्य की स्थापना मतलब की सबसे छोटी इकाई की शाखा व्यवस्था को भागीदार बनाए बगैर देश का कल्याण दुरूह है।

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salil saroj

सलिल सरोज
विधायी अधिकारी
नयी दिल्ली


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