Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Jitendra_Kabir, poem

यह कैसा समाज?

 यह कैसा समाज? जितेन्द्र ‘कबीर’ हत्यारों से.. पशुओं को बचाने की खातिर रक्षक दल हमने लिए बनाए, मगर अफसोस दरिंदों …


 यह कैसा समाज?

जितेन्द्र 'कबीर'
जितेन्द्र ‘कबीर’

हत्यारों से..

पशुओं को बचाने की खातिर

रक्षक दल हमने लिए बनाए,

मगर अफसोस

दरिंदों से..

अपनी बच्चियों को बचाने की खातिर

कोई नहीं हमने किये उपाय।

पशुओं की तस्करी के आरोपी

लोगों की जान 

पीट-पीटकर लिए जाना

है बहुत से लोगों को स्वीकार्य

मगर अफसोस

बच्चियों एवं महिलाओं के साथ

बलात्कार और हत्या के 

आरोपियों के खिलाफ आवाज उठाना

जरूरी न समझा जाए।

यह किस तरह का समाज

हुए जा रहे हैं हम?

जहां राजनीति में फायदे के हिसाब से

पशुओं की सुरक्षा की जाए

लेकिन इंसानों की सुरक्षा की बात

राजनीति में ही दबा दी जाए।

                                 जितेन्द्र ‘कबीर’

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति – अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

Maa- Archana chauhan

February 16, 2022

माँ इंसान नहीं अब सामानों की ,फिक्र बस रह गई तू ही बता ए जिंदगी , तू इतनी सस्ती कैसे

सम्मान-डॉ. माध्वी बोरसे!

February 14, 2022

सम्मान! एक वक्त की थी यह बात,खरगोश ने कछुए का उड़ाया मजाक, कितना धीमे चलते हो तुम,कछुए को आया गुस्सा

लालची लोमड़ी-डॉ. माध्वी बोरसे

February 14, 2022

लालची लोमड़ी! भरी दोपहर में एक दिन लोमड़ी भटके,कर रही थी भोजन की तलाश,दिखे उसे बेल में अंगूर लटके,किया उसे

बुर्का, हिजाब और घुंघट सब गुलामी की निशानी

February 14, 2022

 बुर्का, हिजाब और घुंघट सब गुलामी की निशानी जब से मानव समाज की शुरुआत हुई है तब से लेकर अब

मेरे लेखन का ध्येय- जितेन्द्र ‘कबीर

February 14, 2022

मेरे लेखन का ध्येय मुझे पता है कि आजकल मेरा लेखनसरकार में शामिल दलों औरउनके समर्थकों को नहीं भाता हैक्योंकि

जनता का जूता जनता का ही सिर-जितेन्द्र ‘कबीर’

February 14, 2022

जनता का जूता जनता का ही सिर देश में उपलब्ध होने वालीहर एक वस्तु एवं सेवा परमनचाहा कर लगाकर लोगों

Leave a Comment