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मानवीय मृत्यु का अनसुल्झा रहस्य

 मानवीय मृत्यु का अनसुल्झा रहस्य  आधुनिक प्रौद्योगिकी युग में भी मनुष्य या कोई जीव मृत देह मैं कैसे बदल जाता …


 मानवीय मृत्यु का अनसुल्झा रहस्य 

मानवीय मृत्यु का अनसुल्झा रहस्य
आधुनिक प्रौद्योगिकी युग में भी मनुष्य या कोई जीव मृत देह मैं कैसे बदल जाता है, विज्ञान इस सवाल से निरंतर जूझ रहा है? 

मानवीय मृत्यु एक अनसुल्झी पहेली बनी हुई है – शरीर से आखिर ऐसा क्या निकल जाता है कि शरीर निर्जीव हो जाता है!! – एड किशन भावनानी

गोंदिया – कुदरत द्वारा बनाई इस अनमोल ख़ूबसूरत सृष्टि में कुदरत की अनमोल कलाकृति मानवीय जीव के रूप में सृजित हुई और जिस मानवीय कुनबे में शिशु का जन्म होता है वहां खुशियों की बहार छा जाती है ऐसा सदियों से हजारों वर्षों से होता आया है और वर्तमान काल में भी हो रहा है। परंतु जब किसी मानवीय जीव की मृत्यु हो जाती है तो आदि अनादि काल से यह भी सच है कि उसी कुनबे में अति संवेदनशील दुखों का पल छा जाते हैं और उनका कुनबा यह सोचने पर मज़बूर हो जाता है कि आखिर ऐसा क्या इस शरीर में से निकल गया जो यह शरीर निर्जीव हो गया जो आज के वर्तमान परिपेक्ष में भी एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है!!! जिसके विज्ञान, विशेषज्ञों, जानकारों के अलग अलग तर्क दिए गए हैं परंतु हमारे बड़े बुजुर्गों और आध्यात्मिकता में यह ईश्वर अल्लाह की देन है और कहा गया है कि हम मानवीय जीव उसके हाथ के बने खिलौने हैं जिनका वह जीवन फिक्स कर देता है और समय आने पर उसे तोड़ देता है याने मृत्यु!!परंतु आधुनिक प्रौद्योगिकी युग में भी मनुष्य या कोई भी जीव मृत दे ह में कैसे बदल जाता है विज्ञान इस सवाल से निरंतर जूझ रहा है!! 

साथियों बात अगर हम मृत्यु की करें तो यह नाम सुनते ही दिल दहल जाता है, कांप जाता है। जिस तरह हमने कोरोना महामारी कॉल की पीक़ स्थिति में मृत्यु का तांडव देखे, तो दिल पसीज़ गया था। हमनें फिल्म उद्योग की पुरानी फिल्म पुष्पांजलि का दर्द भरा गीत, दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते हैं कहां, कैसे ढूंढे कोई उनको नहीं होते नामोनिशान और चिट्ठी न कोई संदेश, ना जाने कौन सा देश, जहां तुम चले गए सुनें होंगे जो दुखों के पलों में अक्सर याद आते हैं। हालांकि इन गीतों से भी वही प्रश्न गूंज रहा है कि आखिर मानवीय शरीर में से ऐसा क्या निकल जाता है और कहां चला जाता है जो शरीर निर्जीव हो जाता है!! उसका रहस्य आज भी अनसुलझा है! और मेरा मानना है कि शायद कभी सुल्झेगा भी नहीं चाहे कितना भी प्रौद्योगिकी विज्ञान का उपयोग किया जाए? 

साथियों बात अगर हम मृत्यु की करें तो, मृत्यु शब्द नही बल्कि, मीडिया में जानकारी के अनुसार, मृत्यु एक परम पवित्र मंगलकारी देवी है। सामान्य भाषा मे किसी भी जीवात्मा अर्थात प्राणी के जीवन के अन्त को मृत्यु कहते हैं। मृत्यु सामान्यतः वृद्धावस्था, लालच, मोह,रोग,, कुपोषण के परिणामस्वरूप होती है। मुख्यतया मृत्यु के 101 स्वरूप होते है, लेकिन मुख्य 8 प्रकार की होती है। जिसमे बुढ़ापा, रोग, दुर्घटना, अकस्मती आघात, शोक,चिंता, ओर लालच मृत्यु के मुख्य रूप है।

साथियों बात अगर हम विज्ञान विशेषज्ञों, जानकारों की करें तो उनका अलग-अलग तर्क है, हालांकि विज्ञान के अनुसार, मृत्यु का अर्थ है जीवित प्राणी के शरीर की सभी जैविक प्रक्रियाओं का समाप्त हो जाना। जैविक प्रक्रिया को दिल के धड़कने, मस्तिष्क के निर्णय लेने की क्षमता, किडनी और लीवर जैसे अंगों के सुचारु ढंग से काम करने में समझा जा सकता है। ये प्रक्रियाएं समाप्त होते ही हमारी मृत्यु हो जाती है। विशेषज्ञों की जानकारीके अनुसार शरीर की जैविक प्रकियाएं कई कारणों से रुक सकती हैं। उम्र का ढल जाना यानी बूढ़ा हो जाना, किसी दूसरे व्यक्ति का प्राणघातक हमला, कुपोषण, बीमारी, आत्महत्या, भूख, प्यास, दुर्घटना या आघात आदि से ये प्र‌किया रुक सकती है। मृत्यु के बाद शरीर तेजी से विघटित होता है, और कई तत्वों में टूट जाता‌ है। भारतीय दर्शन में ये संकल्पना है ही कि शरीर का ‌निर्माण पंचतत्वों से हुआ है और अंतत: उन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है। 

साथियों लेकिन जीवन और मृत्यु के बीच सटीक सीमा रेखा क्या है? किस क्षण में जीवन मृत्यु में बदल जाता है? शरीर का वह कौन अंतिम अंग या कण है, जिसके रुकते ही जीवन रुक जाता है और मनुष्य या कोई भी जीव मृत देह में बदल जाता है, विज्ञान इस सवाल से निरंतर जूझ रहा है?बहरहाल मनुष्य का शरीर एक अद्भुत मशीन है। जिसका हर पुर्जा एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। लेकिन यह सवाल अभीअनुत्तरित है कि वह कौन सा तत्व है जिसे जीवन का जनक माना जाए या जीवन के न होने की वजह माना जाए!!!

साथियों बात अगर हम बड़े बुजुर्गों और आध्यात्मिकता के दृष्टिकोण की करें तो उनके अनुसार यह जन्म मृत्यु ईश्वर अल्लाह की देन है उनके अनुसार, आध्यात्मिक दृष्टिकोण से आत्मा शरीर में वास करती हैं। मगर मृत्यु के बाद ये शरीर को त्याग देती है और दूसरे शरीर को धारण कर लेती है। आत्मा ईश्वर का ही एक स्वरूप है। मगर इसे कोई देख नहीं सकता है। आत्मा को नश्वर माना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से इसका न कोई आकारा होता है और न ही स्वरूप, मृत्यु एक जीव को बनाए रखने वाले सभी जैविक कार्यों की अपरिवर्तनीय समाप्ति है।

साथयों बात अगर हम मृत्यु के बाद दोबारा जीवन की करें तो मीडिया के अनुसार, मृत्यु के बाद क्या होता है, क्या दोबारा जीवन मिलता है, या फिर नहीं। इस बात पर चर्चा फिर से शुरू हो गई है। मीडिया के अनुसार एक प्रदेश में हाल ही में तीन ऐसी घटनाएं हुईं, जिनमें मृत्यु के बाद जीवन मिला। विज्ञान की भाषा में कहें तो सब कुछ व्यर्थ की बातें हैं, लेकिन आज भी कुछ अनसुलझे रहस्य हैं, जिनके आगे विज्ञान भी नतमस्तक है। यह कहना गलत इस लोक के बाहर दुनिया नहीं है या जिस तरह पृथ्वी पर जिस तरह जीवन है, उस तरह अन्य गृहों पर जीवन नहीं है। विज्ञान भी ऐलियन जैसी बातों को मान रहा है। इसलिए यह भी सत्य है, कि हमारे शास्त्रों के अनुसार पूरे ब्रह्मांड को चलाने वाले शक्ति भी है और हमारी मृत्यु के बाद कर्मों का लेखा जोखा होता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि मानवीय मृत्यु का अनसुलझा रहस्य!! आधुनिक प्रौद्योगिकी युग में भी मनुष्य या कोई भी जीव मृत देह में कैसे बदल जाता है!! विज्ञान इस सवाल से निरंतर जूझ रहा है? मानवीय मृत्यु एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है कि शरीर से आखिर ऐसा क्या निकल जाता है कि शरीर निर्जीव हो जाता है। 

-संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र


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