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भारतीय सशस्त्र बलों के बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण की आवश्यकता/The need for massive modernization of the Indian Armed Forces

भारतीय सशस्त्र बलों के बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण की आवश्यकता भारत के पास रक्षा उपकरणों के विनिर्माण के लिये एक …


भारतीय सशस्त्र बलों के बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण की आवश्यकता

भारत के पास रक्षा उपकरणों के विनिर्माण के लिये एक उचित औद्योगिक आधार का अभाव है। हालाँकि तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में दो रक्षा क्षेत्र स्थापित किये गए हैं जो निजी क्षेत्र को परिचालन के लिये आधार प्रदान करेंगे। इन क्षेत्रों की स्थापना और विनिर्माण कार्य शुरू किये जाने के बाद पूरी रक्षा अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिलेगी। रक्षा उद्योग में अनुसंधान एवं विकास की आवश्यकता के साथ सामरिक स्वायत्तता सुनिश्चित करना जरूरी हो गया है, भू-राजनीति के बढ़ते चरण और विवैश्वीकरण के साथ, अनुसंधान एवं विकास में सुधार के माध्यम से रक्षा निर्माण में सुधार करना अनिवार्य हो जाता है। उभरते सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के साथ, सीमा पार साइबर हमले, ड्रोन हमले, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने के लिए कृत्रिम तकनीक का उपयोग जैसे नए खतरे उभर रहे हैं जिन्हें अनुसंधान एवं विकास के माध्यम से समाप्त किया जा सकता है।

-प्रियंका सौरभ

किसी दिए गए क्षेत्र में उपयोगी व्यापारिक संबंधों को बनाए रखने के लिए शांति महत्वपूर्ण है। हालांकि, यह शांति तभी हासिल हो सकती है जब सैन्य खर्च किया जाए। सैन्य खर्च सैन्य ताकत बनाता है। यह शक्ति आक्रमणकारियों के लिए एक निवारक के रूप में कार्य करती है। भारत धीरे-धीरे रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण की ओर बढ़ रहा है, जैसे कि भारत ने अपना स्वदेशी विमान तेजस तैयार किया है।
भारत अपने स्वयं के इंजन, एवियोनिक्स और आत्मनिर्भर रडार के निर्माण में अभी भी पिछड़ा है।
विमान के विभिन्न हिस्सों के डिज़ाइन और विकास में काफी प्रगति हुई है, लेकिन जब एक कॉम्पैक्ट विमान प्रणाली या एक हथियार प्रणाली की बात आती है, तो भारत एक अन्वेषक है, निर्माता नहीं।

भारत में रक्षा क्षेत्र की पहचान आत्मनिर्भरता के अवसरों के महासागर के साथ एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में की जाती है। भारतीय सशस्त्र बलों के बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण की आवश्यकताओं के साथ, आत्म निर्भर भारत के लिए भारत के दृष्टिकोण ने रक्षा क्षेत्र के स्वदेशीकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए और गति प्रदान की है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा जारी एक अध्ययन के अनुसार, भारत 12 इंडो-पैसिफिक देशों में से चौथे स्थान पर है। लेकिन चिंता की बात यह है कि भारत को 2016-20 में अपने सशस्त्र बलों के लिए हथियारों के दूसरे सबसे बड़े आयातक के रूप में भी स्थान दिया गया है। यह रक्षा अनुसंधान और विकास के बहुत कम आवंटन के कारण हो सकता है जो 2022-23 में कुल रक्षा बजट परिव्यय का केवल 1.7% है जो दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं से परे है।

भारत की संपूर्ण अधिग्रहण प्रक्रिया काफी सुस्त है और रक्षा उपकरण प्राप्त करने की योजना बनाने से लेकर उसे क्रियान्वित करने के लिये काफी लंबी प्रक्रिया है। इस अवधि को कम कर प्रक्रिया को प्रक्रिया को अधिकतम 1-2 वर्ष तक करना एक बड़ी चुनौती है। सार्वजनिक रक्षा विनिर्माण क्षेत्र वास्तव में जिस तरह से इसे अनिवार्य किया गया है उसे पूरा करने में सक्षम नहीं है। यह क्षेत्र अपने आप में रक्षा क्षेत्र की सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं है, इसलिये निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। भारत के पास रक्षा उपकरणों के विनिर्माण के लिये एक उचित औद्योगिक आधार का अभाव है। हालाँकि तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में दो रक्षा क्षेत्र स्थापित किये गए हैं जो निजी क्षेत्र को परिचालन के लिये आधार प्रदान करेंगे। इन क्षेत्रों की स्थापना और विनिर्माण कार्य शुरू किये जाने के बाद पूरी रक्षा अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिलेगी।

रक्षा उद्योग में अनुसंधान एवं विकास की आवश्यकता के साथ सामरिक स्वायत्तता सुनिश्चित करना जरूरी हो गया है, भू-राजनीति के बढ़ते चरण और विवैश्वीकरण के साथ, अनुसंधान एवं विकास में सुधार के माध्यम से रक्षा निर्माण में सुधार करना अनिवार्य हो जाता है। उभरते सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के साथ, सीमा पार साइबर हमले, ड्रोन हमले, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने के लिए कृत्रिम तकनीक का उपयोग जैसे नए खतरे उभर रहे हैं जिन्हें अनुसंधान एवं विकास के माध्यम से समाप्त किया जा सकता है। भारत हथियारों का सबसे बड़ा आयातक है जो 2017- 2021 के बीच की अवधि के दौरान वैश्विक हथियारों के आयात का लगभग 11% है। घरेलू उत्पादन में वृद्धि हो तो आयात पर निर्भरता को कम कर सकते हैं और चालू खाता शेष को सुधारने में भी मदद कर सकते हैं।

रक्षा बाजार में बढ़ती वैश्विक हिस्सेदारी के बावजूद भारत दुनिया में सेना पर तीसरा सबसे बड़ा खर्च करने वाला देश है, यह रक्षा उपकरणों के निर्माण में पीछे है। अनुसंधान एवं विकास पर बढ़ते व्यय से भारत आधुनिक रक्षा उपकरणों का निर्माण करने में सक्षम हो सकता है जिनकी विश्व स्तर पर मांग है। हिंद महासागर को कवर करने वाले पड़ोसियों और क्षेत्र का शुद्ध सुरक्षा प्रदाता बनने के लिए, भारत को बेहतर हथियार उपकरणों के निर्माण के साथ-साथ अपनी सैन्य ताकत में सुधार के लिए अनुसंधान एवं विकास में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी चाहिए। आईएनएस विक्रांत का हाल ही में उद्घाटन, एक स्वदेशी रूप से विकसित विमानवाहक पोत, आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर) की दिशा में एक बड़ी छलांग है, जिसे अनुसंधान एवं विकास में व्यय में वृद्धि और कार्यबल को कौशल प्रशिक्षण के माध्यम से और बढ़ाया जा सकता है।

इससे भारत रक्षा क्षेत्र में शीर्ष वैश्विक स्थान पर पहुंच सकेगा। सरकार आत्मनिर्भर बनने की दिशा में सही कदम उठा रही है, लेकिन रक्षा क्षेत्र की उम्मीद को पूरा करने के लिये सार्वजनिक उपक्रमों को बढ़ावा देने और उन्हें विशिष्ट कार्य सौंपने आवश्यकता है। निजी क्षेत्र को शामिल करने के लिये एक नई नीति लाने पर लगातार प्रयास किया जा रहा है। हालाँकि इस क्षेत्र के समर्थन और उत्थान के लिये अभी काफी कार्य किया जाना है ताकि उनके प्रयास व्यर्थ न हों। भारत की समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये नौसेना पर ध्यान केंद्रित किये जाने की तत्काल आवश्यकता है। बंदरगाहों का पुनरुद्धार और आधुनिकीकरण, एक अन्वेषक से निर्माता के लिये स्थानांतरण, साथ ही तकनीकी बढ़त पर पकड़ बनाए रखना भारत को एक अलग पहचान प्रदान करता है।

About author 

–प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

facebook – https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/

twitter- https://twitter.com/pari_saurabh



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