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बच्चों को अपनी पसंद के दोस्त चुनने दीजिए

“बच्चों को अपनी पसंद के दोस्त चुनने दीजिए” “हर रिश्तों से उपर दोस्ती का रिश्ता होता है, उच्च नीच और …


“बच्चों को अपनी पसंद के दोस्त चुनने दीजिए”

“हर रिश्तों से उपर दोस्ती का रिश्ता होता है, उच्च नीच और असमानता की विचारधारा से परे होता है। नहीं फ़र्क पड़ता दोस्तों को एक दूसरे की हैसियत से, एक दोस्त के लिए अपना दोस्त हर किरदार से सुपर होता है”

एहसास हो या चीज़ें साझा करने से असमानता की खाई आहिस्ता-आहिस्ता भर जाती है। हमारे समाज की ये विडम्बना है और इंसान के मन में एक ऐसी मानसिकता पनपती है की उच्च वर्ग के बच्चें ही समझदार और संस्कारी होते है,मध्यम वर्गीय या गरीब घर के बच्चें उध्धत और उच्छृंखल होते है। जब की बात उल्टी होती है, धनवानों के बच्चें आजकल बिगड़े हुए और व्यसनों के शिकार होते अपनी ज़िंदगी की दिशा से भटके हुए पाए जाते है। 

पढ़े लिखे पैसेदार लोग अक्सर अपने बच्चों को आस-पास की बस्ती वाले, कामवाले, धोबी या वाॅचमैन के बच्चों के साथ अपने बच्चों को न दोस्ती करने देते है न खेलने देते है। सच पूछिए तो ये व्यवहार गलत है। 

सामान्य परिवार के बच्चें ज़्यादा मेहनती होते है और किसी काम को छोटा नहीं समझते। अपने माँ-बाप को उन्होंने पूरी ज़िंदगी ज़िंदगी की चुनौतियों से जद्दोजहद करते हुए देखा होता है, इसलिए खुद कुछ बनने की इच्छा रखते है। अपने माँ-बाप के प्रति अपना फ़र्ज़ समझते सम्मान का भाव रखते है। इसलिए बच्चों को हर वर्ग के बच्चें के साथ घुल-मिलकर दोस्ती रखने दीजिए। हो सकता है सामान्य और गरीब घर के बच्चों से संपन्न परिवार के बच्चें दो अच्छी  बातें सीख जाएँ।

अगर सामान्य परिवार के बच्चों की दोस्ती उच्च परिवार के बच्चों से होती है तो उन बच्चों का जीवन स्तर उपर उठता है, क्रोस क्लास फ्रैंडशिप बच्चों में समानता का भाव उत्पन्न करती है। अगर आप सक्षम है तो किसी गरीब के होनहार  बच्चे को अच्छी स्कूल में दाखिला दिलवाकर उसे एक सुखी संपन्न ज़िंदगी दे सकते हो। दो अलग-अलग वर्ग के बच्चें जब दोस्त बनते है तब अगर उच्च परिवार का बच्चा अपने सामान्य परिवार के दोस्त से अपनी चीज़ें या लंच बोक्स साझा करेगा तो उस बच्चे के मनमें लघुताग्रंथी का भाव नहीं आएगा।

हाॅस्टल में भी अगर बच्चों को अपनी मर्ज़ी की रूम मैट चुनने की बजाय इस तरह से दो अलग-अलग वर्गों के बच्चों को साथ रहने दिया जाए तो आर्थिक असमानता वाली मानसिकता में कभी आएगी। 

दोस्ती एक ऐसा नि:स्वार्थ रिश्ता है की बच्चों के मन पर जिसका असर सबसे ज़्यादा होता है। सामान्य परिवार का बच्चा जब उच्च परिवार के बच्चों की सुख सुविधा देखता है तब ऐसी लाइफ़स्टाइल पाने के लिए दुगनी मेहनत करता है, उसके विचारों में खुल्लापन आता है और अपने दम पर सबकुछ पाकर एक बेहतरीन इंसान बनता है। इसलिए बच्चों को अपनी पसंद के दोस्त चुनने की आज़ादी दीजिए। सामान्य या गरीब परिवार के बच्चों के मन से हीन भावना का अग्निसंस्कार होगा और समानता के भाव से भरा एक सुगठित समाज का निर्माण होगा।

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर

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