Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

lekh, Salil Saroj

प्रकृति रक्षति रक्षितः

 प्रकृति रक्षति रक्षितः  संस्कृत भाषा मे लिखित श्लोक “धर्मो रक्षति रक्षितः” जिसका वर्णन महाभारत व मनुस्मृति में मिलता है का …


 प्रकृति रक्षति रक्षितः

प्रकृति रक्षति रक्षितः

 
संस्कृत भाषा मे लिखित श्लोक “धर्मो रक्षति रक्षितः” जिसका वर्णन महाभारत व मनुस्मृति में मिलता है का अर्थ है कि जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है और पूर्ण श्लोक “धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः/तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्” का अर्थ है जो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। धर्म की रक्षा करने वाला मनुष्य कभी पराजित नहीं होता, क्योंकि उसकी रक्षा स्वयं धर्म (ईश्वर, मनुष्य, प्रकृति, ब्रह्माण्ड, इत्यादि) करता है। आज जब मानव प्राकृतिक असंतुलन की वजह से अनगिनत गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है तो ठीक इसी श्लोक की भाँति “प्रकृति रक्षति रक्षितः ” मतलब जो प्रकृति की रक्षा करता है, प्रकृति भी उसी की रक्षा करती है, की महती आवश्यकता है। मानव जीवन की उत्पत्ति के साथ ही प्रकृति ने मनुष्य को उसकी जरूरत की हर चीज़ मुहैया कराई, लेकिन तदनुपरांत मनुष्य की जरूरतें ना ख़त्म होने वाली ख़्वाहिशों और दिखावट में तब्दील होने लगी; मनुष्य और प्रकृति के बीच एक जंग छिड़ गई, जिसका कुपरिणाम दोनों को ही झेलना पड़ रहा है। प्रकृति अपने दर्द का निवारण खुद कर सकती है लेकिन उसकी समय अवधि ज्यादा होती है इसलिए हम मानव जाति से यह अपेक्षा की जाती है कि हम प्रकृति को मलहम लगाने में अपने स्वार्थ से उठकर मदद करें ताकि प्रकृति हमें हमारी जरूरत की चीज़ें – साफ़ हवा, पानी, अन्न आदि बिना किसी भेदभाव के प्रदान करती रहे।

दुनिया का हर धर्म शांति का पैरोकार है कम से कम तब जब प्रकृति संरक्षण की बात होती है। विश्व के सभी धर्मों में पर्यावरण को संरक्षित करने की बात कही गई है। प्रकृति के संरक्षण के लिये विभिन्न धार्मिक समूहों द्वारा वैश्विक या स्थानीय स्तर पर कई प्रयास किये जा रहे हैं। पाकिस्तान में स्थित कब्रगाहों में प्राचीन वृक्षों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं क्योंकि इनको काटना गुनाह माना जाता है, लेबनान के मैरोनाईट चर्च ने हरीसा के जंगलों को पिछले 1,000 वर्षों से संरक्षित रखा है, थाईलैंड के बौद्ध भिक्षुओं ने संकटग्रस्त जंगलों की रक्षा हेतु वहाँ छोटे-छोटे विहारों की स्थापना की है तथा उसको पवित्र जंगल घोषित किया गया है।
इसके अलावा जर्मनी के 300 चर्चों ने स्थानीय समुदायों के सहयोग से सौर ऊर्जा प्रणाली अपनाई है तथा वृहत स्तर पर इसका लगातार प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। अमेरिका में रहने वाले अफ्रीकी मूल के लोगों द्वारा क्वान्ज़ा त्योहार प्रकृति संरक्षण का एक उपयुक्त उदाहरण है। वर्ष 1986 में इटली के शहर असीसी में विश्व वन्यजीव कोष द्वारा ‘असीसी घोषणा’ का आयोजन किया गया। इसमें विश्व के पाँच प्रमुख धर्मों (ईसाई, हिंदू, इस्लाम, बौद्ध तथा यहूदी) के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था ताकि वे इस मुद्दे पर सुझाव प्रस्तुत कर सकें कि उनके धर्मों में प्रकृति संरक्षण हेतु क्या प्रावधान है तथा किस प्रकार वे योगदान कर सकते हैं। वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण हेतु विभिन्न धर्मों के सहयोग से अलायंस ऑफ रिलिजन एंड कंजर्वेशन नामक संगठन की स्थापना वर्ष 1995 में की गई थी। विश्व वन्यजीव कोष द्वारा तथा अलायंस ऑफ रिलिजन एंड कंजर्वेशन के सहयोग से ‘लिविंग प्लैनेट कैंपेन’ नामक एक मुहिम शुरू की गई। इसके तहत विश्व के प्रमुख धर्मों ने पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्य करने की प्रतिबद्धता प्रदर्शित की तथा उनकी इस प्रतिबद्धता को ‘जीवंत पृथ्वी के लिये पवित्र उपहार’ का नाम दिया गया। इस अभियान के तहत वकालत, शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि, संपत्ति, जीवनशैली तथा मीडिया के क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहित करना शामिल है। इस प्रतिबद्धता के तहत जैन धर्म ने अंतर्राष्ट्रीय जैन व्यापार पुरस्कार प्रारंभ किया है। इसके तहत उन कंपनियों को पुरस्कृत किया जाता है जिन्होंने पर्यावरणीय प्रभावों को कम करते हुए प्रगति की है। इसी प्रकार स्वीडन के लूथरन चर्च के सहयोग से स्वीडन में नेशनल फॉरेस्ट स्टीवार्डशिप काउंसिल की स्थापना की गई।

भारतीय परिप्रेक्ष्य की बात करें तो लोक संस्कृति में मानव की भूमिका प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षक/प्रबंधक के रूप में मानी गई है। इसमें मानव के साहचर्य के हजारों सन्दर्भ हैं और पर्यावरण के साथ उत्तम सामंजस्य रखने की सीख दी गई है। पेड़ों की पूजा करने से लेकर धरती व नदियों को मां के पवित्र सम्बोधन से नवाजने का संस्कार भी है। हमारे लोकगीत, लोक नृत्य, लोक कथाएं, लोक त्योहार – ये सब प्रकृति-प्रेम को प्रकट करने वाले हैं। मनोरंजन, खेतों में बुवाई, धान की कटाई आदि अवसरों पर हमारे पुरखे मिल-जुलकर जल, पृथ्वी, वायु अग्नि और आकाश की महिमा का बखान करते थे। कृतज्ञता का भाव उनके रोम- रोम से प्रकट होता था। लोक कहावतों व लोक कथाओं पर नज़र डालें तो उनकी सीख में पर्यावरण के प्रति श्रद्धा का भाव झलकता है। रामायण, महाभारत, गीता, वायु-पुराण, स्कन्द पुराण, भविष्य पुराण, वराह पुराण, ब्रह्म पुराण, मार्कण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण, गरुड़ पुराण, श्री विष्णु पुराण, भागवत पुराण, श्रीदेवी भागवत पुराण वेद, उपनिषद तथा अन्य धार्मिक ग्रन्थ, पेड़-पौधे, जीव-जन्तुओं पर दया करने की सीख देते हैं। मानसिक शान्ति, शारीरिक सुख, इन सबकी पूर्ति के साधन प्राकृतिक सम्पदा ही है। गेहूँ, जौ, तिल, चना, चन्दन, लाल पुष्प, केसर, खस, कमल, ताम्बूल, श्वेत पुष्प, बांस, मिट्टी, फल, तुलसी, हल्दी, पीत-पुष्प, शहद इलाइची, सौंफ, उड़द, काले-पुष्प, सरसों के फूल, मुलेठी देवदार, बिल्व वृक्ष की छाल, आम, पला, खैर, पीपल, गूलर, दूब, कुश आदि को संरक्षित रखने के उद्देश्य से इन्हें किसी दिन,त्योहार, देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना से जोड़ा गया है। औषधि के रूप में फलों तथा जड़ी-बूटियों की रक्षा करने की बात कही गयी है और इन्हें घरों के निकटस्थ लगाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखने की सलाह दी गयी है, जैसे- अंगूर, केला, अनार, सेब, जामुन, प्याज, लहसुन, गाजर, मूली, नींबू, अदरक, आंवला, घीया, बादाम, आम, टमाटर, अखरोट, अजवाइन, अनानास, अश्वगंधा, गिलोय, तम्बाकू, तरबूज, तुलसी, दालचीनी, धनिया, पुदीना, संतरा, पान, पीपल, बबूल, ब्राह्मी बूटी, काली मिर्च, लाल मिर्च, लौंग, हरड़, बहेड़ा आदि अनेक बूटियों का प्रयोग करने से मनुष्य निरोग रह सकता है।

हमें प्रकृति संरक्षण सीखने के लिए किसी अन्य देश या तकनीक की आवश्यकता नहीं है। हमारे धर्म, शास्त्रों में यह बहुतायत में लिखा गया है और हमारे पूर्वजों ने प्रकृति संरक्षण के अनेकों बेहतरीन उपाय बताए हैं जिसकी लिए ज्यादा धन की भी आवश्यकता नहीं है। उन्होनें इसे हमारी आदत में शामिल कर के एक रोज़मर्रा की चीज़ की तरह पेश किया था ना कि आज की तरह किसी ख़ास दिन पर वृक्षारोपण कार्यक्रम की तरह। संरक्षण में सिर्फ पेड़ लगाना ही नहीं बल्कि उनकी जान बचाना भी शामिल है और यह किस तरह किया जा सकता है, यह हमें विरासत में मिली है जिसे हमें पुनर्जीवित करने की और उन्हें संभालने की ख़ास जरूरत है। हमारे ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है. इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है- ‘वृक्षात् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव:’ अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं- ‘अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु’ यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है। हम कह सकते हैं कि इन्हीं वनों में हमारी सांस्कृतिक विरासत का संवर्धन हुआ है। हिन्दू संस्कृति में वृक्ष को देवता मानकर पूजा करने का विधान है। वृक्षों की पूजा करने के विधान के कारण हिन्दू स्वभाव से वृक्षों का संरक्षक हो जाता है। सम्राट विक्रमादित्य और अशोक के शासनकाल में वन की रक्षा सर्वोपरि थी। वैदिक काल में जीवित वृक्षों को काटना प्रतिबंधित था और ऐसे कृत्यों के लिए दंड निर्धारित किया गया था। उदाहरण के लिए, याज्ञल ६ए, स्मृति, ने पेड़ों और जंगलों को काटने को दंडनीय अपराध घोषित किया है और 20 से 10-रानी का दंड भी निर्धारित किया है। चाणक्य ने भी आदर्श शासन व्यवस्था में अनिवार्य रूप से अरण्यपालों की नियुक्ति करने की बात कही है। पर्यावरण संरक्षण के कानून की दृष्टि से मुगल सम्राटों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है उनके महलों के चारों ओर फलों के बागों और हरे भरे पार्कों की स्थापना, केंद्रीय और प्रांतीय मुख्यालय, सार्वजनिक स्थान, नदियों के किनारे और घाटी में वे गर्मी के मौसम के स्थानों या अस्थायी मुख्यालय के रूप में इस्तेमाल करते थे।

हमारे महर्षि यह भली प्रकार जानते थे कि पेड़ों में भी चेतना होती है, इसलिए उन्हें मनुष्य के समतुल्य माना गया है। ऋग्वेद से लेकर बृहदारण्यकोपनिषद्, पद्मपुराण और मनुस्मृति सहित अन्य वाङ्मयों में इसके संदर्भ मिलते हैं. छान्दोग्य उपनिषद में उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं। हिन्दू दर्शन में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है- दशकूप समावापी: दशवापी समोहृद:/दशहृद सम:पुत्रो दशपत्र समोद्रुम:। इसी संस्कृति में हर भारतीय घर में तुलसी का पौधा कहीं न कहीं मिल ही जाता है। तुलसी का पौधा मनुष्य को सबसे अधिक प्राणवायु ऑक्सीजन देता है। तुलसी के पौधे में अनेक औषधीय गुण भी मौजूद हैं पीपल को देवता मानकर भी उसकी पूजा नियमित इसलिए की जाती है क्योंकि वह भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देता है। देवों के देव महादेव तो बिल्व-पत्र और धतूरे से ही प्रसन्न होते हैं। यदि कोई शिवभक्त है तो उसे बिल्वपत्र और धतूरे के पेड़-पौधों की रक्षा करनी ही पड़ेगी। वट पूर्णिमा और आंवला ग्यारस का पर्व मनाना है तो वट वृक्ष और आंवले के पेड़ धरती पर बचाने ही होंगे। हिन्दुओं के चार वेदों में से एक अथर्ववेद में बताया गया है कि आवास के समीप शुद्ध जलयुक्त जलाशय होना चाहिए। जल दीर्घायु प्रदायक, कल्याणकारक, सुखमय और प्राणरक्षण होता है। शुद्ध जल के बिना जीवन संभव नहीं है। यही कारण है कि जल स्रोतों को बचाए रखने के लिए हमारे ऋषियों ने इन्हें सम्मान दिया। पूर्वजों ने कल-कल प्रवाहमान सरिता गंगा को ही नहीं वरन सभी जीवनदायिनी नदियों को मां कहा है। हिन्दू धर्म में अनेक अवसर पर नदियों, तालाबों और सागरों की मां के रूप में उपासना की जाती है। छान्दोग्योपनिषद् में अन्न की अपेक्षा जल को उत्कृष्ट कहा गया है। महर्षि नारद ने भी कहा है कि पृथ्वी भी मूर्तिमान जल है। अंतरिक्ष, पर्वत, पशु-पक्षी, देव-मनुष्य, वनस्पति सभी मूर्तिमान जल ही हैं। जल ही ब्रह्मा है। महान ज्ञानी ऋषियों ने धार्मिक परंपराओं से जोड़कर पर्वतों की भी महत्ता स्थापित की है।

पर्वत, देश के प्रमुख पर्वत देवताओं के निवास स्थान हैं और अगर पर्वत देवताओं के वास स्थान नहीं होते तो कब के खनन माफिया उन्हें उखाड़ चुके होते। विंध्यगिरी महाशक्तियों का वास स्थल है, कैलाश महादेव की तपोभूमि है। हिमालय को तो भारत का किरीट कहा गया है। महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भवम्’ में हिमालय की महानता और देवत्व को बताते हुए कहा है- ‘अस्तुस्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज:’ भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा का विधान इसलिए शुरू कराया था क्योंकि गोवर्धन पर्वत पर अनेक औषधि के पेड़-पौधे थे, मथुरा के गोपालकों के गोधन के भोजन-पानी का इंतजाम उसी पर्वत पर था। मथुरा-वृन्दावन सहित पूरे देश में दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा धूमधाम से की जाती है। इसी तरह हमारे महर्षियों ने जीव-जन्तुओं के महत्व को पहचान कर उनकी भी देवरूप में अर्चना की है। मनुष्य और पशु परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। हिन्दू धर्म में गाय, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, हाथी, शेर और यहां तक की विषधर नागराज को भी पूजनीय बताया है। प्रत्येक हिन्दू परिवार में पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकाली जाती है। चींटियों को भी बहुत से हिन्दू आटा डालते हैं। चिडिय़ों और कौओं के लिए घर की मुंडेर पर दाना-पानी रखा जाता है। पितृपक्ष में तो काक को बाकायदा निमंत्रित करके दाना-पानी खिलाया जाता है। इन सब परंपराओं के पीछे जीव संरक्षण का संदेश है। हिन्दू गाय को मां कहता है, उसकी अर्चना करता है। नागपंचमी के दिन नागदेव की पूजा की जाती है। नाग-विष से मनुष्य के लिए प्राण रक्षक औषधियों का निर्माण होता है। नाग पूजन के पीछे का रहस्य ही यह है। हिन्दू धर्म का वैशिष्ट्य है कि वह प्रकृति के संरक्षण की परम्परा का जन्मदाता है। हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक जीव के कल्याण का भाव है। हिन्दू धर्म के जितने भी त्योहार हैं, वे सब प्रकृति के अनुरूप हैं। मकर संक्रान्ति, वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होली, नवरात्र, गुड़ी पड़वा, वट पूर्णिमा, ओणम, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देव प्रबोधिनी एकादशी, हरियाली तीज, गंगा दशहरा आदि सब पर्वों में प्रकृति संरक्षण का पुण्य स्मरण है।

प्रकृति का उपहार हमें अपनी आगे वाली पीढ़ी से गिरवी के रूप में मिली है जिसकी जान बचने की जिम्मेदारी हम पर है। महात्मा गाँधी कहते थे – प्रकृति के पास हमारी जरूरतों के लिए पर्याप्त संसाधन है लेकिन लोभ के लिए पूरी पृथ्वी अलबत्ता पूरा ब्रह्माण्ड भी कम है। अपनी जरूरतों को अगर सीमित नहीं कर सकते तो जरूरतों को लालच में तब्दील ना करने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। मार्टिन लूथर किंग ने कहा है – किसी एक के ऊपर अन्याय सबके ऊपर अन्याय है। यदि प्रकृति के साथ आज आप अपने आस पास न्याय नहीं कर रहे हैं तो इसके दूरगामी परिणाम आपके विश्व के किसी कोने में किसी न किसी रूप में देखने को मिलेंगे। पृथ्वी पर एक स्वस्थ जीवन की परिकल्पना मनुष्य और प्रकृति के साहचर्य के बिना करना असंभव है। हम सब को चेतने की सख़्त जरूरत है और यदि अब भी देर की तो यह आख़िरी देर होगी।

About Author

सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
नई दिल्ली


Related Posts

Paryavaran me zahar ,praniyon per kahar

June 27, 2021

 आलेख : पर्यावरण में जहर , प्राणियों पर कहर  बरसात का मौसम है़ । प्रायः प्रतिदिन मूसलाधार वर्षा होती है़

Lekh aa ab laut chalen by gaytri bajpayi shukla

June 22, 2021

 आ अब लौट चलें बहुत भाग चुके कुछ हाथ न लगा तो अब सचेत हो जाएँ और लौट चलें अपनी

Badalta parivesh, paryavaran aur uska mahatav

June 12, 2021

बदलता परिवेश पर्यावरण एवं उसका महत्व हमारा परिवेश बढ़ती जनसंख्या और हो रहे विकास के कारण हमारे आसपास के परिवेश

lekh jab jago tab sawera by gaytri shukla

June 7, 2021

जब जागो तब सवेरा उगते सूरज का देश कहलाने वाला छोटा सा, बहुत सफल और बहुत कम समय में विकास

Lekh- aao ghar ghar oxygen lagayen by gaytri bajpayi

June 6, 2021

आओ घर – घर ऑक्सीजन लगाएँ .. आज चारों ओर अफरा-तफरी है , ऑक्सीजन की कमी के कारण मौत का

Awaz uthana kitna jaruri hai?

Awaz uthana kitna jaruri hai?

December 20, 2020

Awaz uthana kitna jaruri hai?(आवाज़ उठाना कितना जरूरी है ?) आवाज़ उठाना कितना जरूरी है ये बस वही समझ सकता

Leave a Comment